हिंदी फिल्मों में मनोज कुमार को हमेशा साफ़ सुथरी, देश भक्ति और आवश्यक सामाजिक मुद्दों से जुडी फिल्मो का नायक माना गया । फिल्म संतोष के बारे में आपने शायद ही सुना होगा । इस फिल्म का मोहिंदर कपूर के स्वर में गाया गीत अपने शब्दों की अभिव्यक्ति के कारन बहुत ही अच्छा बन पड़ा हैं । देखिये
आज मैं बेचैन हूँ आज मैं बेचैन हूँ
यार मैं बेचैन हूँ आज मैं बेचैन हूँ
ये महज तनहाइयाँ दर्द की अंगडाईयां
मौत की परछायिया यार मैं बेचैन हूँ ..............
एक नफ में माता एक गोरी का शबाब
एक मेरे दिन ख़राब ,यार मैं बेचैन हूँ ............
ये महल ये तख्तो ताज ये शरीफों के रवाब
हैं कहाँ बंदा नवाज , यार मैं बेचैन हूँ ........
गीत गाना हैं मना मुस्कराना हैं मना
सर उठाना हैं मना , यार मैं बेचैन हूँ ...........
(फिर सभी गाते हैं )
एक जिंदगी नहीं जिसको जी रहे हम
आस कोई भी नहीं घुट के रहा गया हैं दम
( फिर मनोज कुमार गाते हैं )
चल रहा हैं कारवां -2
चल रहा हैं नौजवान -2
सो रहे हैं रहनुमा , यार मैं बेचैन हूँ , आज मैं बेचैन हूँ ...................
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
बुधवार, 27 जनवरी 2010
आज गा लो मुस्करा लो महफिलें सजा लो ( ललकार फिल्म )
हिंदी फिल्मो में कई गीत बहुत ही संवेदनशील होते हैं । मैंने हमेशा अपने इस ब्लॉग में सिर्फ सार्थक और संवेदनशील गीत ही डालने की कोशिश की हैं , उन्ही में से एक हैं ये गीत जिसके गीतकार हैं हसरत जयपुरी । ये फिल्म थी ललकार जो सैनिकों के ऊपर बनी थी । इस गाने की पृष्ठभूमि ये हैं कि धर्मेन्द्र के बड़े भाई राजेंदर कुमार कि मृत्यु कि खबर से सब फौजी थोड़े दुखी होते हैं जिसके बाद धरमेंदर दारा सिंह आदि फौजिओं को संबोधित करते हुए ये गीत गाते हैं । जब धरमेंदर गाने के अंतिम दौर में होते हैं तो उनके पिता आ जाता हैं जो वाकई फिल्म के इस दृश्य को काफी भावुक बना देते हैं । इस गीत के बोल देखिये :-
आज गा लो मुस्करा लो , महफिले सजा लो
क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए
जीवन की डोर बड़ी कमजोर
किसको खबर हैं कहाँ टूट जाए , गा लो मुस्करा लो ...........
टूटा हुआ तारा हैं नदिया की धारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
हमसे जो बिछड़ा हैं साथी हमारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
अब ये नज़र रास्ते से हटा लो , गा लो मुस्करा लो ...........
शहीदों का खून हैं वफ़ा की निशानी
ये आंसुओं से धोते नहीं हैं
ये मौत हैं नाज़ करने के काबिल
वीरो की मौत पे रोते नहीं हैं
आज यादों को उनके गले से लगा लो , गा लो मुस्करा लो ................
आज गा लो मुस्करा लो , महफिले सजा लो
क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए
जीवन की डोर बड़ी कमजोर
किसको खबर हैं कहाँ टूट जाए , गा लो मुस्करा लो ...........
टूटा हुआ तारा हैं नदिया की धारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
हमसे जो बिछड़ा हैं साथी हमारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
अब ये नज़र रास्ते से हटा लो , गा लो मुस्करा लो ...........
शहीदों का खून हैं वफ़ा की निशानी
ये आंसुओं से धोते नहीं हैं
ये मौत हैं नाज़ करने के काबिल
वीरो की मौत पे रोते नहीं हैं
आज यादों को उनके गले से लगा लो , गा लो मुस्करा लो ................
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा , इंसान की औलाद हैं इन्सान बनेगा ( फिल्म धुल का फूल , 1959 )
इस गीत को गाया हैं मोहम्मद रफ़ी ने । आज 26 जनवरी हैं इसीलिए सोचा कि देशभक्ति से भरा गीत दोहराया जाए ।
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इंसान कि ओलाद हैं इंसान बनेगा
अच्छा हैं अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं हैं ,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं हैं
जिस इल्म ने इंसानों को तकसीम किया हैं
उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं हैं
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ........
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा, तू हिन्दू बनेगा ....
नफरत सिखाये जो धर्म तेरा नहीं हैं
इन्सां को रौंदे वो कदम तेरा नहीं हैं
कुरान ना हो जिसमे वो मंदिर नहीं तेरा
गीता ना हो जिसमे वो हरम तेरा नहीं
तू अमन और सुलह का अरमान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ....
ये दीन के ताजिर ये वतन बेचने वाले
इंसानों की लाशो के कफ़न बेचने वाले
ये महलो में बैठो हुए कातिल ये लुटेरे
कांटो के एवज रूह ऐ चमन बेचने वाले
तू इनके लिए मौत का एलान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा .....
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इंसान कि ओलाद हैं इंसान बनेगा
अच्छा हैं अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं हैं ,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं हैं
जिस इल्म ने इंसानों को तकसीम किया हैं
उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं हैं
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ........
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा, तू हिन्दू बनेगा ....
नफरत सिखाये जो धर्म तेरा नहीं हैं
इन्सां को रौंदे वो कदम तेरा नहीं हैं
कुरान ना हो जिसमे वो मंदिर नहीं तेरा
गीता ना हो जिसमे वो हरम तेरा नहीं
तू अमन और सुलह का अरमान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ....
ये दीन के ताजिर ये वतन बेचने वाले
इंसानों की लाशो के कफ़न बेचने वाले
ये महलो में बैठो हुए कातिल ये लुटेरे
कांटो के एवज रूह ऐ चमन बेचने वाले
तू इनके लिए मौत का एलान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा .....
या दिल की सुनो दुनियावालो -( अनुपमा फिल्म 1966)
ये गीत हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म अनुपमा से लिया हुआ हैं । गीतकार हैं कैफ़ी आज़मी ( शबाना आज़मी के पिता ) और गायक हैं हेमंत कुमार । गाने का फिल्मांकन धर्मेन्द्र के लिए हुआ हैं । गीत की दर्द से ओत प्रोत पंक्तियाँ ये हैं
या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूँ जो कहते हैं उनको कहने दो
ये फूल चमन में कैसा खिला माली की नज़र में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या क्या देख लिया अब बहते हैं आंसू बहने दो ,
या दिल की ..........
एक ख्वाब ख़ुशी का देखा नहीं देखा जो कभी तो भूल गए
माँगा हुआ तुम कुछ दे ना सके , जो तुमने दिया वो सहने दो ,
या दिल की ...
क्या दर्द किशी का लेगा कोई इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आंसू और बहे अब ऐसे तसल्ली रहने दो ,
या दिल की ....
या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूँ जो कहते हैं उनको कहने दो
ये फूल चमन में कैसा खिला माली की नज़र में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या क्या देख लिया अब बहते हैं आंसू बहने दो ,
या दिल की ..........
एक ख्वाब ख़ुशी का देखा नहीं देखा जो कभी तो भूल गए
माँगा हुआ तुम कुछ दे ना सके , जो तुमने दिया वो सहने दो ,
या दिल की ...
क्या दर्द किशी का लेगा कोई इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आंसू और बहे अब ऐसे तसल्ली रहने दो ,
या दिल की ....
सोमवार, 25 जनवरी 2010
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं -प्यासा फिल्म
गुरुदत्त जी जैसे फिल्मकार को उनकी प्रतिभा का हर कोई कायल हैं । सिर्फ उनतालीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गयी । प्यासा फिल्म उनके सबसे बेहतरीन फिल्मो में से एक थी । वो इतनी प्रेरक और दर्दभरी फिल्मे छोड़ गए हैं कि लगता हैं कि कोई सत्तर अस्सी साल के अनुभव वाला व्यक्ति होगा गुरुदत्त ।
उन्होंने प्यासा फिल्म 1962 में बनायीं थी । असल में सरकारी मशीनरी सिर्फ नेहरु गुणगान में लगी हुई थी जैसे कि भारत बहुत विकास कर रहा हैं पर गुरुदत्त ने अपनी इस फिल्म में वास्तविकता दिखाई और इसमें उस समय के लिए दो प्रासंगिक गीत बनवाए , जिनमे एक था "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हैं " और दूसरा था " जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं " । इस दुसरे गीत के बोल इस प्रकार हैं
ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के ये लूटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ हैं कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं
ये दिलफेंक गलियां ये बदनाम बाज़ार गुमनाम राही ये सिक्कों कि झंकार
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार ,जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो .......
ये सदियों से बेखौफ सहमी सी गलिया ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलिया
ये बिकती हुई खोखली रंगरलिया, जिन्हें नाज़ हैं .........................
वो उजाले दरीचो में पायल कि छनछन थकी हारी साँसों पे तबले कि धनधन
वो बेरूह कमरों में खासी कि खनखन , जिन्हें नाज़ हैं .................
ये फूलों के गजरें ये पीकों के छीटें , ये बेबाक नज़रें ये गुस्ताख फिकरे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे , जिन्हें नाज़ हैं .................
यहाँ पीर भी आ चुके हैं जवां भी तनोमंद बेटे भी अब्बा मियां भी
ये बीवी भी हैं और बहन भी हैं माँ भी , जिन्हें नाज़ हैं ...............
मदद चाहती हैं ये हव्वा कि बेटी , यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत जुलेखां की बेटी , जिन्हें नाज़ हैं ..........
ज़रा हिंद के रहबरों को बुलाओ , ये गलिया ये कूचे ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर उनको लाओ , जिन्हें नाज़ हैं ...........
प्रेमाभक्ति की अनूठी बातें
प्रेमाभक्ति हमेशा ही आनंद का विषय रहा हैं , इसीलिए जो प्यार और विविधता इसमें हैं वो ज्ञान में दिखाई नहीं देती । अगर technical भाषा में कहे तो भक्ति customized हैं और ज्ञान by default हैं , मतलब ज्ञान में आप कोई राह नहीं बनाते बल्कि एक पहले ही बनाये रस्ते पर आगे बढ़कर इश्वर को पाते हैं जबकि भक्ति में कुछ भी नियम नहीं होंगे ,हमेशा सारे मायने बदल जाएंगे । ऐसे ही कुछ प्रसंग देखें :
एक महिला साधक का वर्णन प्रेम के बारे में
जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि तुम प्रीत ना करिहो कोए ।
रामायण में निषादराज गुह भगवान् से ही कह देते हैं कि प्रभु हमसे भक्ति के अपेक्षा ना करिए । हमारे तो दिन रात पाप करने में व्यतीत होते हैं और आप शुक्र मानिए कि हम आपके भोजन और वस्त्र चोरी करके नहीं ले गए ।
और भगवान् को गंगा नदी पार करवाने वाले केवट ने तो कहा कि चाहे मुझे लक्ष्मण जी बाण भी मारे तो भी मैं बिना श्री राम के चरण धुलाये नाव में नहीं बैठने दूंगा .
कबीर जी तो अनूठी ही बात कहते हैं ( हिन्दुओं के मूर्ति पूजा के बारे में )
पाहन पूजे ते हरि मिले तो मैं पूजा पहार
ताते तो चक्की भली पीसी खाए संसार
और मुस्लिमों के बारे में उन्होंने कहा कि
कंकड़ पत्थर जोड़ के ली मस्जिद बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।
तो इस प्रकार हमने इश्वर प्रेम के अनूठे प्रसंग देखे , ये थोडा संक्षेप में था । कुछ और मिला तो जरुर लिखूंगा
एक महिला साधक का वर्णन प्रेम के बारे में
जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि तुम प्रीत ना करिहो कोए ।
रामायण में निषादराज गुह भगवान् से ही कह देते हैं कि प्रभु हमसे भक्ति के अपेक्षा ना करिए । हमारे तो दिन रात पाप करने में व्यतीत होते हैं और आप शुक्र मानिए कि हम आपके भोजन और वस्त्र चोरी करके नहीं ले गए ।
और भगवान् को गंगा नदी पार करवाने वाले केवट ने तो कहा कि चाहे मुझे लक्ष्मण जी बाण भी मारे तो भी मैं बिना श्री राम के चरण धुलाये नाव में नहीं बैठने दूंगा .
कबीर जी तो अनूठी ही बात कहते हैं ( हिन्दुओं के मूर्ति पूजा के बारे में )
पाहन पूजे ते हरि मिले तो मैं पूजा पहार
ताते तो चक्की भली पीसी खाए संसार
और मुस्लिमों के बारे में उन्होंने कहा कि
कंकड़ पत्थर जोड़ के ली मस्जिद बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।
तो इस प्रकार हमने इश्वर प्रेम के अनूठे प्रसंग देखे , ये थोडा संक्षेप में था । कुछ और मिला तो जरुर लिखूंगा
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
भक्ति से सम्बंधित कुछ अनुपम दोहे- भाग एक
कबीर जी अपनी बेबाकी के लिए प्रसिद्ध हैं । उनको बस विरले ही समझ पाते हैं । वे हमारी मान्यताओं पर ठोक व्यवहार करते हैं । ऐसा ही एक दोहा हैं
उज्जवल पहने कापड़ा पान सुपारी खाय
कबीर हरि की भक्ति बिन बाँधा यमपुर जाय
संतों ने एक दोहा बताया हैं
डूबे सो बोले ही नहीं बोले सो अनजान
गहरो प्रेम समुद्र को कोऊ डूबे चतुर सुजान
इसका भाव यह हैं की इश्वर एक समुन्द्र की तरह हैं जो इश्वर के बारे में जानता हैं वो तो उसी में समा जाता हैं कुछ कह नहीं पाता, इसीलिए जो इश्वर के बारे में कहता हैं इसका मतलब वो अभी इश्वर के बारे में जानता ही नहीं हैं ।
मेरी विनम्र प्रार्थना हैं की संत समाज को इसमें अपवाद माने क्योंकि वो इश्वर को पूर्ण रूप में प्राप्त हैं और इश्वर की दिव्या प्रेरणा से ही हमारे मध्य सेवा के भाव से आया हैं । ऊपर वाला दोहा सिर्फ हमारे जैसे लोगो के लिए लागू होता हैं जो अपने थोड़े भक्ति के साधन को ही परम उपलब्धि मानकर ढोंग करने लगते हैं ।
एक दोहा और भी हैं जो संसार से वैराग्य जगा सकता हैं
छलनी में सदा पानी भरते रहे
अपनी समझ में बड़ा काम करते रहे ।
इसका तात्विक अर्थ यह हैं की हम संसारी लोग सुबह से शाम तक बड़े व्यस्त होकर काम में लगे रहते हैं और अपने इश्वर ,परलोक धर्मसम्बन्धी कामो को बिलकुल उपेक्षित किये रहते हैं । संसार के काम और उपलब्धि से हमें कभी भी मृत्यु से छुटकारा और मृत्यु के बाद की सद्गति नहीं मिल सकती हैं । फिर भी हम ये सब काम करते रहते हैं ।
अर्थात जैसे छलनी में पानी भरना मूर्खता हैं ऐसे ही दुनियादारी के काम भी कभी परलोक नहीं संवारते ।
परम ज्ञानी श्री उद्धव जी जो भगवन कृष्ण के चचेरे भाई थे । गोपियो को ज्ञान की शिक्षा देने गए और खुद ही उनके प्रेम भाव के सामने अपने आप को बौना महसूस करने लगे । गोपिओं ने उनसे सगुन साकार को ही अपना सर्वस्व बताया और निर्गुण निराकार को उपेक्षित बताते हुए कहा
" क्या करे हम ऐसे इश्वर को जो द्वार हमारे आ ना सके
माखन की चोरी कर ना सके मुरली की तान सुना ना सके
मन हर ना सके छल कर ना सके , तरसा ना सके
जो हमरे हृदय लग ना सके हृदय से हमें लगा न सके "
उज्जवल पहने कापड़ा पान सुपारी खाय
कबीर हरि की भक्ति बिन बाँधा यमपुर जाय
संतों ने एक दोहा बताया हैं
डूबे सो बोले ही नहीं बोले सो अनजान
गहरो प्रेम समुद्र को कोऊ डूबे चतुर सुजान
इसका भाव यह हैं की इश्वर एक समुन्द्र की तरह हैं जो इश्वर के बारे में जानता हैं वो तो उसी में समा जाता हैं कुछ कह नहीं पाता, इसीलिए जो इश्वर के बारे में कहता हैं इसका मतलब वो अभी इश्वर के बारे में जानता ही नहीं हैं ।
मेरी विनम्र प्रार्थना हैं की संत समाज को इसमें अपवाद माने क्योंकि वो इश्वर को पूर्ण रूप में प्राप्त हैं और इश्वर की दिव्या प्रेरणा से ही हमारे मध्य सेवा के भाव से आया हैं । ऊपर वाला दोहा सिर्फ हमारे जैसे लोगो के लिए लागू होता हैं जो अपने थोड़े भक्ति के साधन को ही परम उपलब्धि मानकर ढोंग करने लगते हैं ।
एक दोहा और भी हैं जो संसार से वैराग्य जगा सकता हैं
छलनी में सदा पानी भरते रहे
अपनी समझ में बड़ा काम करते रहे ।
इसका तात्विक अर्थ यह हैं की हम संसारी लोग सुबह से शाम तक बड़े व्यस्त होकर काम में लगे रहते हैं और अपने इश्वर ,परलोक धर्मसम्बन्धी कामो को बिलकुल उपेक्षित किये रहते हैं । संसार के काम और उपलब्धि से हमें कभी भी मृत्यु से छुटकारा और मृत्यु के बाद की सद्गति नहीं मिल सकती हैं । फिर भी हम ये सब काम करते रहते हैं ।
अर्थात जैसे छलनी में पानी भरना मूर्खता हैं ऐसे ही दुनियादारी के काम भी कभी परलोक नहीं संवारते ।
परम ज्ञानी श्री उद्धव जी जो भगवन कृष्ण के चचेरे भाई थे । गोपियो को ज्ञान की शिक्षा देने गए और खुद ही उनके प्रेम भाव के सामने अपने आप को बौना महसूस करने लगे । गोपिओं ने उनसे सगुन साकार को ही अपना सर्वस्व बताया और निर्गुण निराकार को उपेक्षित बताते हुए कहा
" क्या करे हम ऐसे इश्वर को जो द्वार हमारे आ ना सके
माखन की चोरी कर ना सके मुरली की तान सुना ना सके
मन हर ना सके छल कर ना सके , तरसा ना सके
जो हमरे हृदय लग ना सके हृदय से हमें लगा न सके "
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...