शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

भक्ति से सम्बंधित कुछ अनुपम दोहे- भाग एक

कबीर जी अपनी बेबाकी के लिए प्रसिद्ध हैं । उनको बस विरले ही समझ पाते हैं । वे हमारी मान्यताओं पर ठोक व्यवहार करते हैं । ऐसा ही एक दोहा हैं

उज्जवल पहने कापड़ा पान सुपारी खाय

कबीर हरि की भक्ति बिन बाँधा यमपुर जाय

संतों ने एक दोहा बताया हैं

डूबे सो बोले ही नहीं बोले सो अनजान
गहरो प्रेम समुद्र को कोऊ डूबे चतुर सुजान
इसका भाव यह हैं की इश्वर एक समुन्द्र की तरह हैं जो इश्वर के बारे में जानता हैं वो तो उसी में समा जाता हैं कुछ कह नहीं पाता, इसीलिए जो इश्वर के बारे में कहता हैं इसका मतलब वो अभी इश्वर के बारे में जानता ही नहीं हैं ।
मेरी विनम्र प्रार्थना हैं की संत समाज को इसमें अपवाद माने क्योंकि वो इश्वर को पूर्ण रूप में प्राप्त हैं और इश्वर की दिव्या प्रेरणा से ही हमारे मध्य सेवा के भाव से आया हैं । ऊपर वाला दोहा सिर्फ हमारे जैसे लोगो के लिए लागू होता हैं जो अपने थोड़े भक्ति के साधन को ही परम उपलब्धि मानकर ढोंग करने लगते हैं ।

एक दोहा और भी हैं जो संसार से वैराग्य जगा सकता हैं
छलनी में सदा पानी भरते रहे
अपनी समझ में बड़ा काम करते रहे ।
इसका तात्विक अर्थ यह हैं की हम संसारी लोग सुबह से शाम तक बड़े व्यस्त होकर काम में लगे रहते हैं और अपने इश्वर ,परलोक धर्मसम्बन्धी कामो को बिलकुल उपेक्षित किये रहते हैं । संसार के काम और उपलब्धि से हमें कभी भी मृत्यु से छुटकारा और मृत्यु के बाद की सद्गति नहीं मिल सकती हैं । फिर भी हम ये सब काम करते रहते हैं ।
अर्थात जैसे छलनी में पानी भरना मूर्खता हैं ऐसे ही दुनियादारी के काम भी कभी परलोक नहीं संवारते ।

परम ज्ञानी श्री उद्धव जी जो भगवन कृष्ण के चचेरे भाई थे । गोपियो को ज्ञान की शिक्षा देने गए और खुद ही उनके प्रेम भाव के सामने अपने आप को बौना महसूस करने लगे । गोपिओं ने उनसे सगुन साकार को ही अपना सर्वस्व बताया और निर्गुण निराकार को उपेक्षित बताते हुए कहा
" क्या करे हम ऐसे इश्वर को जो द्वार हमारे आ ना सके
माखन की चोरी कर ना सके मुरली की तान सुना ना सके
मन हर ना सके छल कर ना सके , तरसा ना सके
जो हमरे हृदय लग ना सके हृदय से हमें लगा न सके "

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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...