सोमवार, 25 जनवरी 2010
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं -प्यासा फिल्म
गुरुदत्त जी जैसे फिल्मकार को उनकी प्रतिभा का हर कोई कायल हैं । सिर्फ उनतालीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गयी । प्यासा फिल्म उनके सबसे बेहतरीन फिल्मो में से एक थी । वो इतनी प्रेरक और दर्दभरी फिल्मे छोड़ गए हैं कि लगता हैं कि कोई सत्तर अस्सी साल के अनुभव वाला व्यक्ति होगा गुरुदत्त ।
उन्होंने प्यासा फिल्म 1962 में बनायीं थी । असल में सरकारी मशीनरी सिर्फ नेहरु गुणगान में लगी हुई थी जैसे कि भारत बहुत विकास कर रहा हैं पर गुरुदत्त ने अपनी इस फिल्म में वास्तविकता दिखाई और इसमें उस समय के लिए दो प्रासंगिक गीत बनवाए , जिनमे एक था "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हैं " और दूसरा था " जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं " । इस दुसरे गीत के बोल इस प्रकार हैं
ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के ये लूटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ हैं कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं
ये दिलफेंक गलियां ये बदनाम बाज़ार गुमनाम राही ये सिक्कों कि झंकार
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार ,जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो .......
ये सदियों से बेखौफ सहमी सी गलिया ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलिया
ये बिकती हुई खोखली रंगरलिया, जिन्हें नाज़ हैं .........................
वो उजाले दरीचो में पायल कि छनछन थकी हारी साँसों पे तबले कि धनधन
वो बेरूह कमरों में खासी कि खनखन , जिन्हें नाज़ हैं .................
ये फूलों के गजरें ये पीकों के छीटें , ये बेबाक नज़रें ये गुस्ताख फिकरे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे , जिन्हें नाज़ हैं .................
यहाँ पीर भी आ चुके हैं जवां भी तनोमंद बेटे भी अब्बा मियां भी
ये बीवी भी हैं और बहन भी हैं माँ भी , जिन्हें नाज़ हैं ...............
मदद चाहती हैं ये हव्वा कि बेटी , यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत जुलेखां की बेटी , जिन्हें नाज़ हैं ..........
ज़रा हिंद के रहबरों को बुलाओ , ये गलिया ये कूचे ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर उनको लाओ , जिन्हें नाज़ हैं ...........
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