गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरा दर्द -एक कविता

अपना दर्द कृष्ण जी को शिकायत के रूप में प्रस्तुत हैं सिर्फ पहला पैरा कृष्ण को समर्पित हैं फिर तो मेरा दर्द शुरू होता हैं और ख़त्म बस जबरदस्ती करना पड़ता हैं . भगवान् के बारे में तो लिखना वैसे ही दुर्लभ लोगो को मिलता हैं पर फिर भी उसके चक्कर में मत पढना .क्योंकि

जब वो अंदर तक आ जायेगा मौत सा दर्द दे जायेगा
कृष्ण नाम एक छलिये बस क्षण में चैन लूट ले जायेगा
उसके चक्कर में ना पड़ो वो तो प्रेम व्यापारी हैं
दिल दिमाग को तहस नहस करने वाला व्यभिचारी हैं
बातो से वो पार हैं पर मीठे बोल सुनाता हैं
सब कुछ छीन लेता हैं पर झूठ सारे रचाता हैं

निर्बल समझ रुलाता रहेगा
करुना को बस अपनी भुनाता रहेगा
व्यभिचार सा कुछ दिखाता रहेगा
प्रेम की आड़ में जिसे मेरा दिल सहेगा
ना कभी तरस उसे मुझ पर आएगा
नश्तर से विरह को जब वो चलाएगा

नजरो में मेरी मुझे गिरा देगा
आँखों में जब आंसू ला देगा
दर्शन नहीं देगा और भगा देगा
पर गिरते ही वो मुझे सजा देगा
जन्मो का बिछड़ा कोई मिला देगा
अश्को में लिपटा वो चेहरा दिखा देगा

कभी समझ नहीं पाया मेरी गलती क्या थी
मछली सी आँखों वाली वो लड़की कहाँ थी
पहले ढूंढ लेता तो आज तमाशा नहीं होता
जिंदगी में शर्मिंदा नमी का समां नहीं होता
रोते रोते आज मेरा दर्द बयान नहीं होता
क्यों सर काटने को मेरे जल्लाद खड़ा नहीं होता
आंसू रुकते नहीं बस छलकते जा रहे हैं
टूट के अरमान बिखरते जा रहे हैं

कितनी तारीखों या संयोगो की मैं बात करता हूँ
जब संयम की ना कोई राह स्वीकार करता हूँ
ना मुझमे और जानवर में मूल अंतर हैं
व्यभिचार मेरा उसका समानांतर हैं
सिर्फ जीव की सी क्षुद्र वासना मुझे भी कमजोर कर गयी
दोस्त वो सबसे अजीज सी मुझे झकझोर कर गयी
उसके सपने क्या सजाऊ जब आज अपने ही टूट गए
भविष्य की नीव रखी थी पर अतीत के भाग रूठ गए

सिर्फ वो मुझे कभी अपना सच्चा दोस्त कहना बंद ना करे
मन में बुरा कहती रहे पर जाहिर में सुनाना ना शुरू करे
सिर्फ उसकी आँखों का विश्वास ही कभी धरोहर था
अपने मन की भावनाओ से उसका रूप मनोहर था
पर भक्ति मेरी डूबी जहाँ मेरी वासना का सरोवर था

छः महीने बस जैसे एक क्षण में तबाह हो गए
रूठे पुत्र के वादे भी पिता के लिए अब स्वाह हो गए
बुझ जाये उसके दीपक जिसने मुझे गिराया
झोंका एक अपराध बोध का मुझ पर आजमाया
संकल्प को मेरे किस देवता ने हटाया
स्वार्थ क्यों अपना उस कमीने ने मिटाया

उसकी नजरो की बात क्या जब कहाँ अपनी पलके खुल पाती हैं
मेरी बड़ी बड़ी बाते ज्ञान की रह रह कर मुझे रुलाती हैं
साधक मन होने का बस एक ढोंग रच लिया हैं
झूठी बातो के बस रस घोल घोल पिया हैं
बेचारी को कैसा तुने ये सदमा दिया हैं
नीचता का ये कैसा हाल तुने अपना किया हैं
भक्ति का बस ढोंग करेगा लूट लेगा कृष्ण दुनिया सारी
"वीरेन " लुटा और लुट गयी वृन्दावन की राधा प्यारी


सच में शायद मीरा जी ने दर्द की वजह से कहा हैं

जो मैं ऐसा जानती की प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती की तुम प्रीत ना करिहो कोई

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

श्री राधा जी और कृष्ण भक्तो की करुण प्रार्थना

सभी कृष्ण भक्त साधको के श्री चरणों में निवेदानात्म्क प्रस्तुति हैं । इसमें कुछ भाव श्री राधा जी के श्री मुख से हैं कुछ एक भक्त साधक के उदगार हैं । भावना अतिरेक के कारण हुए भावो की त्रुटी के लिए खेद हैं ।

मेरे कृष्ण ना अब तेरा वियोग सहन होता हैं
मुझसे ना व्यवहार दुनिया का वहन होता हैं

संभाल अपने ब्रह्मज्ञान को मेरा जीवत्व मुझे लौटा दे
प्रेम ही मेरा खरा सिक्का अब ज्ञान ना तू खोटा दे
विरह में तेरे एक पल भी जीया नहीं जाता
प्यार का तीखा विष किसी भी घडी पीया नहीं जाता

काश उजडती बसती दुनिया के झंझट से निकल पाती
टूटी मेरी आशाओं को कहीं अब दरकिनार कर पाती
बची खुची मेरी जिंदगी मै भी कुछ जी जाऊ
दर्द मेरे रोंए रोयें में पर होठो को सी जाऊ
बहता हैं सागर सा गम पल में पी जाऊ

क्या हुआ अगर मैं तेरी मजिल नहीं थी
क्या श्याम मैं तेरे लिए अजनबी कही थी

विरह की मेरी वेदना मौत तक ले जाएगी
सफ़ेद शांति सी मेरी अर्थी कुछ ना कह पायेगी
मुझे रोना हैं अपनी शवयात्रा में क्योंकि दर्द तो मैं ही जानता हूँ
बचा सकता था इश्वर मेरी आत्महत्या इतना मैं मानता हूँ

भगवान् होना तेरा बहुत सह लिया
ज्ञान गुणगान तेरा बहुत कह दिया
एक आवारा सा जीवन बिताने को कह रही हूँ
मेरी तमन्नाओ में मिट जाने को कह रही हूँ

क्या राधा का रोना तू देखता ही रहेगा
विरह का ये दर्द कब तक उसका दिल सहेगा
रोज़ लुटती हो जो भावो को कब तक सहेजेगी
सच कह रही हूँ आज के बाद ना राधा बचेगी

वेदनाओ का ये कैसा ज्वार मेरे रोम रोम में बहा हैं

तू पटरानियो का श्रीकृष्ण मेरा ना अब श्याम रहा हैं
द्वारिकाधीश होना तेरा इस राधा ने खुद भी तो सहा हैं
क्या मेरी कविता में "वीरेन" ने तुझे वृन्दावन का ग्वाल कहा हैं
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

राधा जी का जवाब ( कविता

यह कविता श्रीमती वंदना गुप्ता जी की ब्लोग्पोस्ट के जवाब में हैं . असल में टिपण्णी ज्यादा बड़ी हो रही थी . इसीलिए मजबूरीवश ऐसा करना पड़ा .वंदना जी के के पोस्ट का लिंक ये हैं . वैसे जरुरी हैं कि मेरे जैसे निम्न स्तर के व्यक्ति से पहले आप उनकी अद्भुत रचना को पढ़े तो तारतम्यता भी बनी रहेगी .
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html

प्रभु हमने आपसे ना कभी रखी कुछ चाह
दुःख हमारा बस थी सच्चे प्रेम की आह
आप तो सर्वसमर्थ थे फिर क्यों नियमो की आड़ देते हो
समाज के अंगो की बिसात आप तो भावो से ही ताड़ लेते हो

आपकी सारी बाते सही पर इसमें राधा का कसूर बताओ
पुरुष प्रधान दुनिया में पिसती रहे जरा दस्तूर समझाओ
जब परमसत्ता तू ही हैं तो फिर क्यों तर्क देता हैं
भविष्य राधा का तू फिर क्यों ना अत्तीत देता हैं

साधना जिसकी तू ठुकरा कर भाग गया
शायद झूठा तेरा कर्मयोग तुझे जाग गया
व्यवहार पर खरा उतरा लोगो के फिर भावो को क्यों नहीं देखा
धोबी का तुझे पूरा ध्यान दिखी ना राधा के दिल की रेखा
सीता ही तो परीक्षा देती रही सदा यहाँ
मर्यादापति के भाग्य में भला ऐसा सौभाग्य कहाँ
वृन्दावन की राधा ही तो प्रतीक्षा करेगी
समर्थ कृष्ण से ना ये कभी प्रथा निभेगी

कृष्ण चाहे तर्कों से बात करे पर राधा को इनसे क्या मतलब हैं
सिर्फ भावो के दम पर वो लुट गयी कहाँ ज्ञान का कोई करतब हैं
सामर्थ्य की परमसत्ता होकर भी राम कृष्ण क्यों बहाने बनाता हैं
टूटती किस्मत सी बनकर सीता राधा सा जीव लुट जाता हैं

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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

रविवार, 12 सितंबर 2010

एक हास्य कविता - शादी के लिए लड़की ढूंढना

यह एक हास्य कविता हैं. सब कुछ वही सा हैं जो आमतौर पर किसी के जीवन में लड़की ढूँढने में होता हैं , मेरा दुःख आपका पूरा मनोरंजन करेगा .

सरल कुमार की अभी तक शादी नहीं हुई थी
कम से कम एक लड़की को तो बर्बादी नहीं छुई थी
फिर भी उसका एक लड़की ढूंढो अभियान चल रहा था
बेवक़ूफ़ दिमाग में ऐश्वर्या को पाने का ख्वाब पल रहा था

तो धीरे धीरे आना जाना लगने लगा
अपनी लुटिया डुबोने को सरल परिश्रम करने लगा .
एक एक कर के उम्मीदे सारी छूटती गयी
नीचे कविता बताएगी की कैसे किस्मत फूटती रही

टुनटुन की एक बहन देखने जो चला गया
सोफे में उसे बैठे देख भैंस होने का भ्रम लगा
पिछले जन्म की कोई हाथी पल्ले पड़ रही थी
बड़े दांतों से क्योंकि शराफत जो झड रही थी
एक बार इतनी काली लड़की का रिश्ता आया
साथ खड़े होने पर जैसे नज़र का टीका लगाया
पतली एक कन्या का जब विकल्प आया था
पंखे बंद करने पर ही उसे ढूंढ पाया था
पढ़ी लिखी एक वधु मिल रही थी
पांचवी फेल वो लड़की इसीलिए बिना दहेज़ मिल रही थी
पता नहीं इतने अच्छे रिश्ते क्यों मिल रहे थे
सरल के अरमान बस धीरे धीरे मर रहे थे

गुज़ारा चलाने को एक दो भैंस पाल रखी थी
पर रिश्ते वालो पर पशु प्रेमी होने की झूठी ढाल रखी थी
टूटी मेरी साईकिल देखकर गाड़ी पटरी से उतर रही थी
हीनभावना मेरी देखकर वो काली लड़की भी निखर रही थी

लड़की के पापा ने पूछा बेटा कितना कमाते हो
शकल तुम्हारी फटीचर पर क्या वेतन भी ऐसा ही पाते हो
मैंने बोला पैकेज तो कम्पनी में ठीक ठाक मिल जाता हैं
रोज की तनख्वाह में मेरा फटा जूता सिल जाता हैं
सैंतीस रुपये का भारी ओवर टाइम भी मिल जाता हैं
मुझे दिखाना पड़ा जैसे मेरा पैसा स्विस बैंक जाता हैं
मुझे यूँ तो अच्छे घरो के रिश्ते आते हैं
बस शकल मेरी देख वो ईद के चाँद हो जाते हैं
आखिर क्यों वो मुझे अपनी बेटी देने से मना करते हैं
क्या हुआ अगर मेरे गुण लगभग उनके नौकर रामू से मिलते हैं

सिर्फ ईश्वर एक सीधी सी लड़की बनाना भूल गया था
विवाहित होने का सपना भंवर में डूब गया था
बस इन्ही बातो को लेकर सरल जी उदास हैं
आएगी कोई प्रिया बस यही "वीरेन " को आस हैं


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

शनिवार, 11 सितंबर 2010

प्यार पर लिखी एक और उदास कविता - भाग इक्कीस

बस जीवन पर लिखी थोड़ी उदास सी पोयम हैं . किसी को पसंद आएगी किसी को नहीं . फिर भी पढ़ ले अपने कीमती समय को ख़राब करने के लिए

मुझे अपनी गलती समझ नहीं आई थी
दिल मेरा था पर क्यों चाहते परायी थी
मेरे पुण्य से ही तो उसका दीपक जगमगाया था
जिसमे मेरा अतीत आया वो मेरा हमसाया था
मेरे मन को प्यारी वो अमानत लौटा दी जाये
मेरी दुआ और मेरे पुण्य सारे मुझे फिर मिल जाये

कितनी तर्कों की मै डोर पकड़ पाया
वक्त ने कैसे इन रिश्तो में उलझाया
सब कुछ मेरे लिए तबाही का मंज़र था
मेरे दिल में ईश्वर का लगा खंजर था

दूर दूर से ही ईश्वर हंसकर भाग गया था
मेरे सुख और उसके दुःख बाँट गया था
इष्ट मंत्रो का मोल अब समझ आया था
गुप्त ही रखना था गुरु ने बताया था

किसी नज़रिए से कभी कोई सपनो में भी नहीं था
पर भाग्य मेरा लिखना वाला चित्रगुप्त भी कही था
ज्यादा अच्छा होना भी क्या बेबस कर गया था
जल उठा चिराग जो पुण्य का तेल रम गया था

नींद उसकी उड़ जाती जिसे परमात्मा कहा गया
दुःख निर्गुण का मुझ सगुण से ना सहा गया
टूटती हसरतो में मेरा सपना बहा जाता था
हे हरि बता तो सही मेरा उससे क्या नाता था

सही और गलत सोच का आधार कुछ भी नहीं था
मर्यादा का जब मंजर तोड़ने को छुआ तक नहीं था
सिर्फ धर्म ही नहीं लुटेरो में कृष्ण भी वही था
जिसकी कोई मदद कर पाता वो "वीरेन " नहीं था

ज्ञानी सारे भगवान् के बड़प्पन कि दुहाई देते रहे
प्रेम के दर्द को नासमझी कहने के स्वर सुनाई देते रहे
कहाँ इष्टदेव कहाँ गुरुवर और सद्ग्रंथो की शरण हटी
बस जिंदगी किसी चरित्रहीन दिल की रेखा पर मर मिटी

अपने दिल में बसी उन यादो को कैसे भुलाऊ
कोई भी विश्वास ना करेगा चाहे मैं मिट जाऊ
सपने जब टूटे तो दूसरा कोई मदद नहीं कर पाया
कितनी बार वीरेन यूँ ही तो ख़तम होता आया

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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कृष्ण प्रेम -कविता


आज एक साधक इंदु बहन की पोस्ट पढ़ी कृष्ण दर्शन पर .उसका लिंक ये हैं

अब मेरे जैसा कृष्ण से गहरी खुंदक खाया इन्सान कैसे उसकी बड़ाई सहन कर लेता आदतवश फिर कलम बगावत कर उठी उस काले कलूटे के लिए जो सुन्दर भी नहीं हैं , पर फिर भी दुनिया दीवानी हैं भला राधा जी जैसा गौरवर्ण चेहरा भी धोखा खा गया इसके छल में तो फिर हम जैसो को सावधान रहना चाहिए . हम अपना दिल क्यों उसको दे जो कुछ औकात रखता ही नहीं हैं . क्यों उसे सर पर चढ़ाये जिसे हमारी भावनाओ की कद्र ही नहीं हैं .

हे साधक बहन !
भ्रम ही तो हैं कृष्ण ,
दुनिया का हमें कुछ पता नहीं
और वो कुछ पता देता नहीं.
पास जाओ तो गायब हो जाता हैं ,
दूर जाओ तो पीछे लग जाता हैं.
उस छलिये से कैसा ये नाता हैं
धोखा देना हमें उसे बहुत भाता हैं
सूने मन का वो ना सहारा हुआ
फिर भी भक्त होकर मैं आवारा हुआ
राधा को पाना भी जिसे गंवारा ना
हुआ
उस कपटी कृष्ण का मैं दीवाना हुआ
बस ऐसा सी ही कुछ शिकायत जैसा हैं
प्यार की दुनिया का ये रब कैसा हैं
धुंधला बादल सा वो क्यों फट नहीं जाता हैं
उफनी नदी का किनारा क्यों कट नहीं जाता हैं
ईश्वर बना कृष्ण क्यों मेरे दर पर नहीं आता हैं
प्यार में जो हाथ बढाओ तो काट खाता हैं
कितनी परेशानी दी होगी तभी मुझसे सजा पाता हैं
कलम में घुसकर "वीरेन " की बस लिखा जाता हैं

रविवार, 5 सितंबर 2010

प्यार पर एक लम्बी कविता -भाग बीस

यह कविता बहुत लम्बी हैं . सारे विषय मिश्रित हैं पर आधार प्रेम ही हैं . असल में एक विषयवस्तु पर लिखी रचना छोटी होती जाती हैं . इस कविता के सारे अंश मेरे और मेरी एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के संवादों से बने हैं बल्कि सच तो यही हैं की सार भाग उसी का हैं मैं तो सिर्फ एक "कूरियर "वाला हु . उसे अगर थोडा सा भी समय मिले तो बताये की मैंने सब चीजों को क्रम में रखा या नहीं, कम से कम baat . पूरे तीन चार महीने के विभिन्न भावो को जोड़कर एक कविता बनी हैं. जब आपके पास कम से कम पंद्रह मिनट हो तो ही इसे पढ़े . इसमें ईश्वर, soulmate प्रेम , धर्म ,समाज, भक्ति का वर्णन मिलेगा . बहुत ही सरल शब्दों में लिखने की कोशिश की हैं . कुछ भी गलत सही आपको लग सकता हैं , फिर भी आध्यात्मिक मार्ग के शीर्ष लोग
मुझे मार्गदर्शन दे.

संवाद यहाँ से शुरू करता हूँ
उसके ही शब्दों से श्रीगणेश रटता हूँ

प्यारे दोस्त, तुम तो एक कवि हो

जब भी आती है एक धारा बहकर
कह जाती है कुछ बातें रुककर
न जाने फिर क्यूँ कलम उठ जाती है
जैसे सारे दर्द बहा ले जाती है
एक सुकून सा छा जाता है दम पर
एक सागर आ जाता है जमीं पर

सचमुच! तुम एक कवि ही हो
इश्वर की रचना की अद्भुत छवि भी हो
भाव तुम्हारे जब शब्द बन जाते हैं

पर कभी तुम ये तो रहस्य बताओ
उस कृष्ण से जरा ये राज तू खुलवाओ
अकेले में अर्जुन को गीता सुनाई थी
अधिकारी समझ ही तो शरण दिखाई थी
फिर ये सबको कैसे पता चली
झूठी ज्ञान गंगा की ये कैसे लहर उठी

कृष्ण ने कब कहा ये सारे दुनिया के लिए हैं
क्यों कर्मयोग की सभी ढोलक शोर किये हुए हैं
प्रेमयोग को लोगो ने क्यों जबरदस्ती बदनाम किया हैं
स्त्री पुरुष की सृजन प्रक्रिया को किसने दरकिनार किया हैं

यूँ तो लोग छोटी छोटी वस्तु की भी गुणवत्ता परखते हैं
फिर सृजन की इस प्रक्रिया में वे कैसे झेंपते हैं
शादियाँ क्यों सख्त परंपरा और झूठी नीवो पर खड़ी हैं
सच्ची आत्माओ को मिलाने वाली परंपरा तो धर्म से बड़ी हैं

कुछ रहस्य जैसे धर्म तो सृजन से ही शुरू होता हैं
संत परंपरा में कोई "सम्भोग से समाधी " का भी गुरु होता हैं
कैसे कोई सच्चा प्यार ऊँचाई पा सकता हैं
कैसे वो प्रभु को काम में दिखा सकता हैं
प्रभु तो जोड़ी बनने को ही तरस गए हैं
क्योंकि दम्पति सिर्फ तनसुख में बस गए हैं

ठीक से निभाया हुआ प्रेम ही पवित्र होता हैं
अपना सच्चा प्यार मिलने से सतचरित्र होता हैं
इन्सान पर मोक्ष नहीं रिश्तो का ऋण होता हैं
अपने सच्चे प्रेमी को पाने में क्यों जीव सोता हैं

जो हैं कब के बिछुड़े उनको मिलाना ही धर्म होता हैं
नहीं संभव एक जन्म तो उनका पुनर्जन्म होता हैं
मेरे पिता का भार मुझ पर अगर थोडा रह जायेगा
पास ही के किसी परिचित के गर्भ में आकर कह जायेगा

यही तेरा प्यार कभी मेरी मृत्यु से तू पहचान ना पाया
तेरा यही क़र्ज़ चुकाने तो सारे संयोग वैसे ही बना पाया
मैंने देखा सब कुछ ऐसे जैसे इतिहास दोहराता हैं
तारिख पर तारिख बदली पर घटना क्रम सारा मेल खाता हैं

कैसे कैसे ज्ञान और प्रेम के तुने बिंदु छुए
एक धार्मिक बहन के हमसाये भी मिला दिए
ग़लतफ़हमी और ज्ञान सारा कुछ मिला जुला
दिल और दिमाग के निर्णय में जीवन का सार घुला

हमारे तन के इन वस्त्रो में कैसे कैसे नगीने जड़े हैं
कहाँ कहाँ से आये भाव और नए रिश्ते बन पड़े हैं
भगवान् भी तो "वीरेन " जैसो की ही परीक्षा लेते हैं
जो साफ़ होते हैं वो वस्त्र ही तो धुला करते हैं

रिश्तो की कहानी एक जगह फिर आकर मिल गयी
सांसो के मिलते ही प्रेम की वो धरा फिर हिल गयी
खड़े होने को कोई आधार बनता नहीं दिख रहा था
कौन जाने ईश्वर किस कलम से प्रारब्ध लिख रहा था

लेकिन युवाओ को तो जिस्मानी प्यार की ही ललक पड़ी हैं
अरे सच्चा प्यार तो आखिरी ज्ञान को लाने वाली जादू झड़ी हैं
एक गलत मिलन ना सुलझने वाली गांठे छोड़ जाता हैं
विज्ञान का तो पता नहीं पर धर्म में इसे पाप कहा जाता हैं
सच्चे प्यार ना मिल जाने से जीवन मरने लग जाता हैं
सुलझाएगा कृष्ण क्योंकि गलत मिलन से प्यार मर जाता हैं

अपने हमसाये को हम इसीलिए सदा सबमे ढूंढते हैं
इसीलिए धर्म को प्रेम और विज्ञान को अणु सूझते हैं
भाषा अलग हैं पर लक्ष्य एक ही हैं
दृष्टा दो हैं पर सदा साक्ष्य एक ही हैं
धर्म और विज्ञान भी एक दिन मिल ही जायेंगे
राधा और कृष्ण का जब वो सारा सार पी पाएंगे


बात यही ख़त्म नहीं होती कही तो गांठे खुली हैं
वहां भी जोड़ दे तो आगे उलझन बड़ी हैं
अमावस के साये तो कभी मिल नहीं पाते हैं
उनके ना मिलने से दुनिया के चित्र कुछ घुल जाते हैं

ऐसी ही कहानी से मेरी दोस्त तू रूबरू हुई
दुनिया बचाने की वो किस्मत तेरे सुपुर्द हुई
कुछ यादो को जोड़ते जोड़ते एक कहानी सी बन गयी
किसी नए इन्सान के पुण्य से प्रेम कहानी सी बन गयी

विश्वामित्र की परीक्षा हो तो मेनका जीत ही जाती हैं
प्रभु की यही इच्छा होती हैं क्योंकि आत्मा मीत पाती हैं
ब्रह्मचर्य के मार्ग से एकाग्रता को पाने का तरीका होता हैं
पर प्रेम तो बस छोटे रस्ते से ईश्वर को पाने का सलीका होता हैं

अष्टांगयोग के बड़े बड़े नियम और विधान हमसे ना पाले जायेगे
प्रभु ने बहाया जिस प्रेम सागर में बस डूब कर मर जायेंगे
उसके हैं वो चाहे तो छीन ले जिंदगी या हमें तार दे
ताकत नहीं झेलने की बस संसार के ना अब भार दे

मुझे अपनी जॉब शादी घर की भी परवाह नहीं
सिर्फ ईश्वर ने प्रेम में फंसाया बाकि मेरा व्यवहार सही
एक दोस्त ही तो सच्चा प्यार सिखा गयी थी
ख़ुशी थी वो की अब पहले जैसी नहीं थी

अन्दर तक उसकी चेतना को बदलने का संघर्ष था
त्याग मेरा ज्यादा था पर ईश्वर से कहा कुछ फ़र्ज़ था
रोग जब परमात्मा दे तो कहाँ माया में मर्ज़ था
मुक्तता की ओर बढती आत्माओ में नाम दर्ज था

मेरी याददाश्त ओर साधक होने का एक बस बोध था
बस इतना ही मेरा प्रयास ना पुनर्जन्म का शोध था
भविष्य भूत वर्तमान के पार भी कुछ आयाम हैं
आत्मा के मोती जहाँ मिल सकते नायाब हैं

दुनियादारी के तरीक से हमारी ये कविता समझ ना आ पायेगी
सिर्फ एक नयी आध्यात्मिक सोच ही कुछ राज छलका जाएगी

इस दिल में मैंने प्यार पनपने ही नहीं दिया था
राम रहीम सा एक इंसान बनने ही नहीं दिया था
राधा कृष्ण मिल ही ना सके ये कैसी घडी हैं
"वीरेन " यहाँ मर रहा हैं ओर तुम्हे उसकी तरक्की की पड़ी हैं हैं .

ये वैसे तो बहुत लम्बी हो सकती थी क्योंकि मेरी उस साधक बहन ने इतना मैटर दिया हैं की कभी ख़त्म ही नहीं होता . मुझे पता नहीं आप में कितने लोग इसे पढेंगे ओर कितनो को ये समझ में आयेगे . जिसके लिए लिखा जा रहा हैं वो बस लाभ उठाये . जिन्हें बोरिंग लगा वो मुझे माफ़ कर दे .


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...