बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

कृष्ण प्रेमाभक्ति को समर्पित एक कविता

यह कविता वैसे एक कृष्ण भक्त साधक को समर्पित हैं । असल में में मैंने एक कथा के वीडियो में उनकी अति दुर्लभ छवि देखि जिसे देखकर सहज ही मन उन्हें प्रणाम करने का हो आया. आशा हैं आप लोगो को मेरे भाव अच्छे लगेंगे जो उनकी भक्ति को समर्पित हो. वैसे भी कृष्ण भक्तो का गुणगान करने का पुण्य बहुत होता हैं और मै इस तरह में पुण्य कमाने में उस्ताद हूँ .

भक्ति में डूबी वो कैसी लड़की हरिभक्तानी थी
मेरे मन को भायी गोपिभाव में डूबी देवांगी थी

उसके चरणों में मर ही जाने का मन करता था
कहीं का नहीं रहा मैं जीने से अब डरता था
घोर कलयुग में भी ऐसे जीव रहते हैं
कृष्ण प्रेम के दिव्य कण जिनके हृदय में बहते हैं

सतत आंसू क्यों ना ऐसे प्रेम पर बहते जाये
अथक मेरे बोल क्यों ना कविता कहते जाये
परम भक्त होने का ये कैसा दर्द सहते आये
सदा सदा हम किशोरी जी के चरणों में रहते आये

इसीलिए कभी हरिभक्तो को आंकना नहीं चाहिए
कृत्रिम प्रकाश नहीं आंसुओ से जलता हृदय चाहिए
तब समझेंगे कि कथा का क्या अर्थ होता हैं
फिर कहेंगे कि क्यों जीव थोथे कर्म ढोता हैं

बिछुड़ी गोलोक धाम की किसी पार्षद की बानगी लगी
अपने प्रिय कृष्ण से एकतरफा भक्ति में दीवानी जगी
क्या प्रेमाभक्ति इतना पागल बना देती हैं
देकर सारा दुःख वो चैन सारा छीन लेती हैं

भक्ति जैसा कुछ ईश्वर को प्यारा आयाम नहीं
राधा मीरा जैसा परम जीव मिल जाये बस कही
तो कृष्ण भी दर्शन पाकर धन्य हो जाता हैं
तभी विरह का हर गीत "वीरेन " गाता हैं

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

भाव दर्शन और निवारण - एक कविता

गुरुदेव दया कर दो की अब मै इस कविता के भाव को पुर्णतः दिव्य बनाकर इसमें आपकी दीक्षा से आई समझ से अलौकिक बनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर सकू. जो भी लिखा जायेगा वो आपकी दया होगी . सब आपका दिया हुआ हैं . पर मेरी नासमझी गलतिया करा देती हैं . फिर भी बापूजी मै आपके शरणागत हूँ . यह आध्यात्मिक कविता किसी व्यक्ति विशेष के उत्तर में हैं कोई मनोरजन के लिए नहीं . वो सूचित कर दे कि उनका मुद्दा सुलझा कि नहीं . बाकि सभी ज्ञान भक्ति से साधको से निवेदन हैं कि त्रुटी बता दे , आपके श्री चरणों में नमन .

मेंरी नजरो में देखो तो यही रूप सर्वोत्तम हैं ,
परमपुरुष शिव के भी इष्ट मर्यादा पुरुषोतम हैं

दोनों भेदों से पार गुरु का निर्गुण अहम् हैं
चरम बिंदु हो या लघु वीरेन उसे दोनों सहन हैं
अपना ही हमसाया सबमे फिर परिवार की बात कहा रही
माता पिता भाई बहन नहीं बस दुनिया एक नदी की धार बही

पूर्णब्रह्म हैं गुरु वो पूरा प्रेम भी जानते हैं
पर हमारी ख़ुशी के लिए कभी कभी व्यवहार मानते हैं
नहीं तो हम गलत मतलब भी समझ जायेंगे
और मनमाने अर्थो से अपना ही अनर्थ कर जायेंगे

उनका गुरु बन जाना हमारा ही स्वार्थ हैं
बापूजी का जन्म तो ईश्वर प्रार्थना का परमार्थ हैं
रघुबीर की इच्छा से ही हनुमान का अंतस हिला होगा
सूक्ष्म रूप से ना शायद ना सीता का पता मिला होगा

पूरब पश्चिप की बात क्या प्रेमाभक्ति तो दिशाओ से भी पार हैं
पूर्ण सरलता के लिए तो ज्ञान भी एक पक्की दीवार हैं
बस शरणागति का एक राजमार्ग सब धर्मो का सार हैं
बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते तो गोपियों के लिए बस भार हैं

सबको कृष्ण जी मिले तो भी राधा का दिल ना टूटेगा
वो कृष्ण की चेतना हैं उसका प्यार अलग हो तो ही बंटेगा
राम के विरह से भरत में उपजी वो द्वापर के विरह की छवि हैं
सच्चे प्रेम का एक आराधक क्या "वीरेन " भी कोई कवि हैं

जो तुने सहा वो तेरी साधना के अंतिम पड़ाव में था
तू किसी को दोष ना दे तेरा हमसाया किसी छलाव में था

वृक्ष की जड़ और शाखाये सच्चे प्रेमी होने की निशानी हैं
उनकी एक गाड़ी के दो पहिये की बात ना मैंने कभी मानी हैं
वो कभी एक जैसे होते ही नहीं सम्पूरक होते हैं
या वो दोनों स्त्री पुरुष या दोनों नपुंसक होते हैं
बस यही था "गे " या "लेस्बियन" का व्यभिचार
मेरी इन गूढ़ बातो को तुम कर लेना स्वीकार
पर ये सब एक क्षणिक अवसाद से आया तुझमे विचार था
त्रिदेवो तक को खंडित किया जिसने वो मन का व्यभिचार था

गुरुत्व तो चेतना की धुरी हैं
विधा ज्ञान और भक्ति हर बार उनसे ही जुडी हैं
वो कृष्ण और राम से उपजे परमहंस हैं
कलयुग मानस में उपजे संतो के राजहंस हैं
उनसा निराला कभी हुआ ना हो सकता हैं
विश्वगुरु बनाना उनका नहीं ईश्वर का स्वार्थ हो सकता हैं

कोई कही जन्मे या मरे हमें ना व्यवहार में पड़ना हैं
ईश्वर खुद कर्म काट दे और झाड़ दे जो झड़ना हैं
बापूजी के वचनों ने ही तो हमेशा राह दिखाई हैं
वर्ना ज्ञान ने तो हमेशा ही नौका डुबाई हैं
शिष्य होने पर भी कहाँ उन्होंने बंधन लादे हैं
हममे ही कमी हैं जो उनके सामने से भागे हैं
इस जन्म का सारे जन्मो से जिन्होंने मुझे पार किया
वही मेरे बापू हैं जिन्होंने बस अपना मुझे स्वीकार किया
फिर भी बहन अपने फायदे के लिए पढ़ ले जो पढना हैं
सिर्फ तेरी मदद के लिए आया और क्या "वीरेन" ने काव्य गढ़ना हैं

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

ईश्वर और हमसाया ( soulmate ) को समर्पित कविता

यह कविता बहुत ही दुर्लभ हैं , सारे भाव ईश्वर प्राप्त साधको के हैंअपने जीवन के अनुभव के तौर पर लिखी हैंसबको समझ नहीं भी सकती हैंजिस जिस को जितना समझ आएगा वो बस ईश्वर के लिए तरस जायेगाबस फिर भी आप मुझे मेल करके पूछ सकते हैं या ब्लॉग पर कमेन्ट करके

राधा
के विरह से उपजा मै प्रेम का अहंकार
नहीं होने का भाव को जिसने कर लिया स्वीकार
जब हैं ही नहीं तो फिर किसकी सत्ता बनकर आया हैं
कृष्ण तो था नहीं फिर किस परम पुरुष का हमसाया हैं

शिवत्व को पाने में अब पार्वती भी लाचार हो गयी हैं
सूर्य किरण के पुण्य से अब दीपक की लौ बुझ गयी हैं
वैष्णवी को किसी और के हवाले किया गया था
कल्कि सा हमसाया जब उसके द्वार ना दिया गया था

अब समय और आत्माए मिलने का वक्त गया हैं
विश्वगुरु बनने का संकल्प उन संत को भा गया हैं
ब्रह्मज्ञान की विधा अभी सर्वोपरि ही बताई जाएगी
परन्तु भक्ति की ऊँचाई तक ना भावनाए लायी जाएगी

उद्धव का पश्चाताप पूरा होने का समय गया हैं
गोपिभाव में क्योंकि वो पूरा नहा गया हैं
कृष्ण के अहम् से अब वो कभी अंगीकार नहीं होगा
अद्वैत को पाया मै अब फिर द्वैत को ही भज लेगा

सगुण सारे निर्गुण हरि से भी पार की बात हैं
ज्ञान का उजाला नहीं भक्ति प्यार की रात हैं
शरणागति से उपजी ये कैसी करामात हैं
गले मिलते बापूजी के दस्तखत आत्मसात हैं

अब मेरे सारे संकल्प पूर्ण में मिलने जा रहे हैं
चरम बिंदु जो अब ज्ञान के मिटने रहे हैं
बहुत बहुत सहे वो विरह के पल उसमे समां जायेंगे
क्या प्रभु मेनका के अंग विश्वामित्र में वफ़ा पाएंगे

ब्रह्मचर्य हो या व्यभिचारी चाहे समय का ही कसूर हो
क्यों अहम् या ग्लानी जब माया तक का ही दस्तूर हो
भक्ति तो इससे आगे के द्वार खोलती हैं
हमसाये में ईश्वर का जब वो अहम् झोंकती हैं
तभी तो एक आत्मा दो शरीरो से वही बोलती हैं
अवचेतन मन की वो बाते कैसे राज खोलती हैं

अच्छा भला या बुरा हो एक भाव भी इधर से उधर नहीं
जो मैंने कहा वो अंतर मन का स्वर्ग कोई बाह्य नरक नहीं
देर से ही सही पर मूल फायदे में पड़ा कुछ फरक नहीं
एक तरफ़ा प्यार में होगा "वीरेन" का बेडा गरक नहीं


गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरा दर्द -एक कविता

अपना दर्द कृष्ण जी को शिकायत के रूप में प्रस्तुत हैं सिर्फ पहला पैरा कृष्ण को समर्पित हैं फिर तो मेरा दर्द शुरू होता हैं और ख़त्म बस जबरदस्ती करना पड़ता हैं . भगवान् के बारे में तो लिखना वैसे ही दुर्लभ लोगो को मिलता हैं पर फिर भी उसके चक्कर में मत पढना .क्योंकि

जब वो अंदर तक आ जायेगा मौत सा दर्द दे जायेगा
कृष्ण नाम एक छलिये बस क्षण में चैन लूट ले जायेगा
उसके चक्कर में ना पड़ो वो तो प्रेम व्यापारी हैं
दिल दिमाग को तहस नहस करने वाला व्यभिचारी हैं
बातो से वो पार हैं पर मीठे बोल सुनाता हैं
सब कुछ छीन लेता हैं पर झूठ सारे रचाता हैं

निर्बल समझ रुलाता रहेगा
करुना को बस अपनी भुनाता रहेगा
व्यभिचार सा कुछ दिखाता रहेगा
प्रेम की आड़ में जिसे मेरा दिल सहेगा
ना कभी तरस उसे मुझ पर आएगा
नश्तर से विरह को जब वो चलाएगा

नजरो में मेरी मुझे गिरा देगा
आँखों में जब आंसू ला देगा
दर्शन नहीं देगा और भगा देगा
पर गिरते ही वो मुझे सजा देगा
जन्मो का बिछड़ा कोई मिला देगा
अश्को में लिपटा वो चेहरा दिखा देगा

कभी समझ नहीं पाया मेरी गलती क्या थी
मछली सी आँखों वाली वो लड़की कहाँ थी
पहले ढूंढ लेता तो आज तमाशा नहीं होता
जिंदगी में शर्मिंदा नमी का समां नहीं होता
रोते रोते आज मेरा दर्द बयान नहीं होता
क्यों सर काटने को मेरे जल्लाद खड़ा नहीं होता
आंसू रुकते नहीं बस छलकते जा रहे हैं
टूट के अरमान बिखरते जा रहे हैं

कितनी तारीखों या संयोगो की मैं बात करता हूँ
जब संयम की ना कोई राह स्वीकार करता हूँ
ना मुझमे और जानवर में मूल अंतर हैं
व्यभिचार मेरा उसका समानांतर हैं
सिर्फ जीव की सी क्षुद्र वासना मुझे भी कमजोर कर गयी
दोस्त वो सबसे अजीज सी मुझे झकझोर कर गयी
उसके सपने क्या सजाऊ जब आज अपने ही टूट गए
भविष्य की नीव रखी थी पर अतीत के भाग रूठ गए

सिर्फ वो मुझे कभी अपना सच्चा दोस्त कहना बंद ना करे
मन में बुरा कहती रहे पर जाहिर में सुनाना ना शुरू करे
सिर्फ उसकी आँखों का विश्वास ही कभी धरोहर था
अपने मन की भावनाओ से उसका रूप मनोहर था
पर भक्ति मेरी डूबी जहाँ मेरी वासना का सरोवर था

छः महीने बस जैसे एक क्षण में तबाह हो गए
रूठे पुत्र के वादे भी पिता के लिए अब स्वाह हो गए
बुझ जाये उसके दीपक जिसने मुझे गिराया
झोंका एक अपराध बोध का मुझ पर आजमाया
संकल्प को मेरे किस देवता ने हटाया
स्वार्थ क्यों अपना उस कमीने ने मिटाया

उसकी नजरो की बात क्या जब कहाँ अपनी पलके खुल पाती हैं
मेरी बड़ी बड़ी बाते ज्ञान की रह रह कर मुझे रुलाती हैं
साधक मन होने का बस एक ढोंग रच लिया हैं
झूठी बातो के बस रस घोल घोल पिया हैं
बेचारी को कैसा तुने ये सदमा दिया हैं
नीचता का ये कैसा हाल तुने अपना किया हैं
भक्ति का बस ढोंग करेगा लूट लेगा कृष्ण दुनिया सारी
"वीरेन " लुटा और लुट गयी वृन्दावन की राधा प्यारी


सच में शायद मीरा जी ने दर्द की वजह से कहा हैं

जो मैं ऐसा जानती की प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती की तुम प्रीत ना करिहो कोई

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

श्री राधा जी और कृष्ण भक्तो की करुण प्रार्थना

सभी कृष्ण भक्त साधको के श्री चरणों में निवेदानात्म्क प्रस्तुति हैं । इसमें कुछ भाव श्री राधा जी के श्री मुख से हैं कुछ एक भक्त साधक के उदगार हैं । भावना अतिरेक के कारण हुए भावो की त्रुटी के लिए खेद हैं ।

मेरे कृष्ण ना अब तेरा वियोग सहन होता हैं
मुझसे ना व्यवहार दुनिया का वहन होता हैं

संभाल अपने ब्रह्मज्ञान को मेरा जीवत्व मुझे लौटा दे
प्रेम ही मेरा खरा सिक्का अब ज्ञान ना तू खोटा दे
विरह में तेरे एक पल भी जीया नहीं जाता
प्यार का तीखा विष किसी भी घडी पीया नहीं जाता

काश उजडती बसती दुनिया के झंझट से निकल पाती
टूटी मेरी आशाओं को कहीं अब दरकिनार कर पाती
बची खुची मेरी जिंदगी मै भी कुछ जी जाऊ
दर्द मेरे रोंए रोयें में पर होठो को सी जाऊ
बहता हैं सागर सा गम पल में पी जाऊ

क्या हुआ अगर मैं तेरी मजिल नहीं थी
क्या श्याम मैं तेरे लिए अजनबी कही थी

विरह की मेरी वेदना मौत तक ले जाएगी
सफ़ेद शांति सी मेरी अर्थी कुछ ना कह पायेगी
मुझे रोना हैं अपनी शवयात्रा में क्योंकि दर्द तो मैं ही जानता हूँ
बचा सकता था इश्वर मेरी आत्महत्या इतना मैं मानता हूँ

भगवान् होना तेरा बहुत सह लिया
ज्ञान गुणगान तेरा बहुत कह दिया
एक आवारा सा जीवन बिताने को कह रही हूँ
मेरी तमन्नाओ में मिट जाने को कह रही हूँ

क्या राधा का रोना तू देखता ही रहेगा
विरह का ये दर्द कब तक उसका दिल सहेगा
रोज़ लुटती हो जो भावो को कब तक सहेजेगी
सच कह रही हूँ आज के बाद ना राधा बचेगी

वेदनाओ का ये कैसा ज्वार मेरे रोम रोम में बहा हैं

तू पटरानियो का श्रीकृष्ण मेरा ना अब श्याम रहा हैं
द्वारिकाधीश होना तेरा इस राधा ने खुद भी तो सहा हैं
क्या मेरी कविता में "वीरेन" ने तुझे वृन्दावन का ग्वाल कहा हैं
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

राधा जी का जवाब ( कविता

यह कविता श्रीमती वंदना गुप्ता जी की ब्लोग्पोस्ट के जवाब में हैं . असल में टिपण्णी ज्यादा बड़ी हो रही थी . इसीलिए मजबूरीवश ऐसा करना पड़ा .वंदना जी के के पोस्ट का लिंक ये हैं . वैसे जरुरी हैं कि मेरे जैसे निम्न स्तर के व्यक्ति से पहले आप उनकी अद्भुत रचना को पढ़े तो तारतम्यता भी बनी रहेगी .
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html

प्रभु हमने आपसे ना कभी रखी कुछ चाह
दुःख हमारा बस थी सच्चे प्रेम की आह
आप तो सर्वसमर्थ थे फिर क्यों नियमो की आड़ देते हो
समाज के अंगो की बिसात आप तो भावो से ही ताड़ लेते हो

आपकी सारी बाते सही पर इसमें राधा का कसूर बताओ
पुरुष प्रधान दुनिया में पिसती रहे जरा दस्तूर समझाओ
जब परमसत्ता तू ही हैं तो फिर क्यों तर्क देता हैं
भविष्य राधा का तू फिर क्यों ना अत्तीत देता हैं

साधना जिसकी तू ठुकरा कर भाग गया
शायद झूठा तेरा कर्मयोग तुझे जाग गया
व्यवहार पर खरा उतरा लोगो के फिर भावो को क्यों नहीं देखा
धोबी का तुझे पूरा ध्यान दिखी ना राधा के दिल की रेखा
सीता ही तो परीक्षा देती रही सदा यहाँ
मर्यादापति के भाग्य में भला ऐसा सौभाग्य कहाँ
वृन्दावन की राधा ही तो प्रतीक्षा करेगी
समर्थ कृष्ण से ना ये कभी प्रथा निभेगी

कृष्ण चाहे तर्कों से बात करे पर राधा को इनसे क्या मतलब हैं
सिर्फ भावो के दम पर वो लुट गयी कहाँ ज्ञान का कोई करतब हैं
सामर्थ्य की परमसत्ता होकर भी राम कृष्ण क्यों बहाने बनाता हैं
टूटती किस्मत सी बनकर सीता राधा सा जीव लुट जाता हैं

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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

रविवार, 12 सितंबर 2010

एक हास्य कविता - शादी के लिए लड़की ढूंढना

यह एक हास्य कविता हैं. सब कुछ वही सा हैं जो आमतौर पर किसी के जीवन में लड़की ढूँढने में होता हैं , मेरा दुःख आपका पूरा मनोरंजन करेगा .

सरल कुमार की अभी तक शादी नहीं हुई थी
कम से कम एक लड़की को तो बर्बादी नहीं छुई थी
फिर भी उसका एक लड़की ढूंढो अभियान चल रहा था
बेवक़ूफ़ दिमाग में ऐश्वर्या को पाने का ख्वाब पल रहा था

तो धीरे धीरे आना जाना लगने लगा
अपनी लुटिया डुबोने को सरल परिश्रम करने लगा .
एक एक कर के उम्मीदे सारी छूटती गयी
नीचे कविता बताएगी की कैसे किस्मत फूटती रही

टुनटुन की एक बहन देखने जो चला गया
सोफे में उसे बैठे देख भैंस होने का भ्रम लगा
पिछले जन्म की कोई हाथी पल्ले पड़ रही थी
बड़े दांतों से क्योंकि शराफत जो झड रही थी
एक बार इतनी काली लड़की का रिश्ता आया
साथ खड़े होने पर जैसे नज़र का टीका लगाया
पतली एक कन्या का जब विकल्प आया था
पंखे बंद करने पर ही उसे ढूंढ पाया था
पढ़ी लिखी एक वधु मिल रही थी
पांचवी फेल वो लड़की इसीलिए बिना दहेज़ मिल रही थी
पता नहीं इतने अच्छे रिश्ते क्यों मिल रहे थे
सरल के अरमान बस धीरे धीरे मर रहे थे

गुज़ारा चलाने को एक दो भैंस पाल रखी थी
पर रिश्ते वालो पर पशु प्रेमी होने की झूठी ढाल रखी थी
टूटी मेरी साईकिल देखकर गाड़ी पटरी से उतर रही थी
हीनभावना मेरी देखकर वो काली लड़की भी निखर रही थी

लड़की के पापा ने पूछा बेटा कितना कमाते हो
शकल तुम्हारी फटीचर पर क्या वेतन भी ऐसा ही पाते हो
मैंने बोला पैकेज तो कम्पनी में ठीक ठाक मिल जाता हैं
रोज की तनख्वाह में मेरा फटा जूता सिल जाता हैं
सैंतीस रुपये का भारी ओवर टाइम भी मिल जाता हैं
मुझे दिखाना पड़ा जैसे मेरा पैसा स्विस बैंक जाता हैं
मुझे यूँ तो अच्छे घरो के रिश्ते आते हैं
बस शकल मेरी देख वो ईद के चाँद हो जाते हैं
आखिर क्यों वो मुझे अपनी बेटी देने से मना करते हैं
क्या हुआ अगर मेरे गुण लगभग उनके नौकर रामू से मिलते हैं

सिर्फ ईश्वर एक सीधी सी लड़की बनाना भूल गया था
विवाहित होने का सपना भंवर में डूब गया था
बस इन्ही बातो को लेकर सरल जी उदास हैं
आएगी कोई प्रिया बस यही "वीरेन " को आस हैं


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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...