इश्वर को पाने के साधन अनंत हैं । बस मुख्य बात ये हैं कि हमारा लक्ष्य इश्वर प्राप्ति हैं या इश्वर से किसी और चीज़ कि प्राप्ति । मैंने जितना अपने बापूजी से सुना और भी दुसरे वन्दनीय संतो से और धार्मिक ग्रंथो से सार सार लिया । उसे संक्षेप में करने कि कोशिश रहा हूँ । यह बहुत ही प्राथमिक स्तर की पोस्ट हैं इसीलिए ज्ञानी और उच्च स्थिति के साधक मेरी बुद्धि पर तरस खाए और मार्गदर्शन करें जिससे नवागंतुक साधक और भी लाभ उठा सके ।
सबसे पहली बात भावना और साधन की हैं , भावना सिर्फ इश्वर प्राप्ति ही होनी चाहिए और साधन कोई भी हो क्योंकि साधन में सफलता प्राप्त करवाना इश्वर का काम हैं , इसीलिए संतो ने हम सब के लिए एक दोहा रचा हैं जिससे हम समझे कि इश्वर का विधान क्या हैं
" ना कहीं से दूर हैं मंजिले ना कोई करीब कि बात हैं ,
जिसे चाहा दर पे बुला लिया जिसे चाहा अपना बना लिया ।
और एक बात हैं कि कभी अपने साधन को ये मत सोचे ये कि ये कमजोर हैं और ये भी ना सोचे कि बस यही अंतिम हैं क्योंकि साधना के स्तर अलग अलग होने के कारन कभी कभी शुरू में सरल साधन फिर थोड़े विविध हो सकते हैं । और सबको एक ही तरह से इश्वर मिलेगा या सबको एक ही निश्चित समय में इश्वर मिलेगा वो भी अनिश्चित हैं ।
तो व्यवहार के लिए सब करो लेकिन गहरे मन में इश्वर को तर्कों का विषय ना बनाये । हो सके तो मेरी ये पोस्ट भी पढ़े , हो सकता हैं आपको फायदा पहुंचे
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_06.हटमल
अगर इश्वर तर्कों का विषय होता तो फिर कम अकल वाले लोगो को कभी मिलता ही नहीं सिर्फ नासा के लोगो को मिलता । अगर नहाने धोने से मिलता तो मछलियों को मिलता । वो तो उसको मिलता हैं जिसकी नीयत सच्ची हो । और इश्वर को आप कभी भी बेवक़ूफ़ नहीं बना सकते मतलब उससे कभी कपट से नहीं मिला जा सकता ।
थोडा धैर्य रखे और साधको में परस्पर द्वेष ना रखे । हर किसी का अपना साधन होता हैं उसमे तुलना ना करें ।
अब साधन ये हैं
१ । पहला और सबसे प्रमाणिक जिसकी सबसे ज्यादा जरुरत हैं -
किसी इश्वर प्राप्त गुरु के शिष्य बने और उनके बताये मार्ग का अनुसरण करे। जो या साधन कर लेता हैं उसके लिए सारा जिम्मा बस यही तक । क्योंकि गुरु तो हर साधन से अपने शिष्य कि योग्यतानुसार कम निकलवा ही लेंगे
२ इश्वर चरित्र सबंधी कथा सुने , सुनाये -
कोई भी इश्वर के बारे में अच्छी बाते कहता हो उनसे ग्रहण करें
३ जप और कीर्तन करें ।
भगवान् के किसी नाम का जप या मधुर गान करें । हमारे जैसे कलयुग के लोगो के लिए यही सबसे श्रेष्ठ साधन बताया गया हैं ।
४ स्मरण , शरणागति और प्रार्थना
इश्वर को सर्वोपरि जानकार आपनी सारी सच्ची बाते उससे निवेदन करें ।
५ वैसे योग का थोडा मुश्किल मार्ग भी हैं जैसे
यम नियम आसन ,ध्यान ,धारणा , प्रत्याहार , समाधी
६ अब आखिरी हैं
सबमे सब जगह अच्छे बुरे हालत में हर धर्म में एक ही सत्ता हैं - बस अगर यही सूत्र पकड़ ले तो भी कल्याण हो जाए ।
ऐसे ही और भी साधन जो आप कर सकते हैं । ये सभी साधन एक साथ भी कर सकते हैं और अलग अलग भी । पर कभी कभी किसी एक दुसरे के साधन का निरादर ना करे क्योंकि इश्वर ने सबके लिए अलग साधन कि व्यवस्था कि हैं । और हर विवाद और संदेह मतलब शास्त्रों में इश्वर कि व्याख्या में उपजे संदेह को सिर्फ तत्काल के सिद्ध संतो से ही पूछे । ऐसी भगवान् विष्णु कि आज्ञा हैं । शास्त्रों के मनमाने दोष निकालने से बचे ।
माता सरस्वती , नारदजी और भगवान् शेष का धन्यवाद ।
भगवान् शिव इस पोस्ट में रह गयी कमी को पूरा करें ।
हरि शरणम् ।
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...
5 टिप्पणियां:
ईश्वर पर कुछ मैं भी लिख रहा हूँ, लेकिन जो मैंने जाना है..वो मेरे भीतर का आनंद है, कला है, हुनर है और कुछ भी नहीं। शायद आप मेरी बात से सहमत न हों, लेकिन अभिव्यक्ति का अधिकार तो सब को है। आपके बताए रास्ते पुराने धार्मिक ग्रंथों से ही मेल खा रहे हैं, अगर उन ग्रंथों से भगवान प्राप्ति होती तो सौ करोड़ की आबादी में से न जाने कितने ही लोगों को प्रभु मिल गया होता है।
ग्रंथों में प्रभु को जाने का रास्ता लिखा, संकेत दिए हैं, लेकिन मनुष्य उन संकेतों को समझ न पाया, क्योंकि उसका ध्यान ग्रंथ पढ़ने वालों ने उसके अर्थों पर न टिकाकर एक प्रतिमा पर टिका दिया, जब तुम्हारा ध्यान निशाने पर न होगा, तो निशाना कैसे लगेगा। ऐसे में आम आदमी उलझकर रह गया। असल में प्रभु ईश्वर अल्ला वाहेगुरू, हमारे भीतर का आनंद, कला और हुनर हैं। जिसने हुनर को, कला को और खुद को जाना, और उसके बाद उसको समाज के भले के लिए लगा दिया वो ईश्वर हो गया। आप देख सकते हैं, इतिहास मिथिहास उठाकर। जिसने अपनी कला को समाज कल्याण के लिए लगा दिया वो महान हो गया, ईश्वर हो गया। भगवान हो गया।
ईश्वर आपको सदा ज्ञान शिरोमणि बनाये . मुझे तो बिलकुल साधारण या नासमझ नौसिखिया समझिये . आप जैसे बिलकुल साफ़ और ऊंचे विचार के व्यक्ति के साथ तर्क करने के लिए मेरे पास तो शब्द भी ही नहीं हैं . काश मैं इस पोस्ट को लिखने से पहले आप से बात कर लेता तो शायद मेरे शब्द परिपक्व होते . हे प्रभु ! कुलदीप हैप्पी जी कि तरह ही आप सबको आपका सच्चा ज्ञान दीजिये क्योंकि यही ऐसे लोग ही समाज का कुछ भला कर सकते हैं . और हे हरि ! मुझे अपनी इन सेवाओं से दूर हटाये और ऐसे कुलदीप जैसे लोगो को आगे लाये . वैसे आप कुलदीप भाई कभी किसी सेवा कि आवशयकता हो तो कृपया मुझे आज्ञा दे मैं आपके श्री चरणों में उपस्थित हो जाऊँगा . तर्क वगैरह करने कि मेरी बुद्धि नहीं हैं क्योंकि मेरा हारना तय हैं . कुलदीप भाई माफ़ करना आपको निराश करने के लिए . मैं तो पोस्ट में पहले ही लिख चुका हूँ कि मार्गदर्शन करें . आपने इतना कीमती समय लगाकर मेरी पोस्ट पर कमेन्ट किया , इसका आभार ही मेरे लिए उतारना भारी हैं .
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
आपको अगर सच में कुछ बुरा लगा है तो मेरी प्रतिक्रिया को अश्वय हटा दें...और आप तो अविराम लिखें। मुझे बार बार यहाँ आना है। सवाल पूछना तो भक्त का पहला कर्तव्य है। मैं तो प्रभु के बारे में जानना चाहता हूँ, मैं आपको आहत कर नहीं सकता क्योंकि वो सर्वव्यापी है और अगर वो सर्वव्यापी है तो आप में भी है। हे प्रभु मुझे क्षमा करना अगर कोई भूल हो गई हो। आप अपनी सेवाएं निरंतर प्रदान करें। मुझे खुशी हो गई।
कौन है आप जो बिना माँगें लूटा रहे है खैर आपके पास है तभी तो वरना कौन देता है किसी को भी अपनी पसंदीदा वस्तु| लेकिन आप ने तो ज्ञान देने का संकल्प कर लिया है सच तो ये है कि माँगना तो में भी चाह रहा हूँ लेकिन उनसे जिसने दो हांथ बनाये है| अब यही कहूँगा मैं साबित तो नही कर सकता मैं कितना धार्मिक हूँ लेकिन आत्मा यही कहती है कि जब धर्म में बने हो तो धार्मिक हो लेकिन भाइ एक बात वो कब आता है जब हम टूट के चूर हो जाते है तब| पर कोई तो है जो ऊपर मुझसे खुश है जिसके कारण मैं यहाँ इस धरती पर हूँ आप से निवेदन है कुछ ग़लत हो तो अपना अबोध जानकर क्षमा कर देना| पहली बार जुड़ रहा हूँ आपके विचारों से इसलिए जो उचित हो वही देना|
मैं भी कुलवंत हैप्पी जी के विचारों से सहमति रखती हूं .. वो परमात्मा है तो पृथ्वी पर भी असंख्य आत्माएं हैं .. उन्हें संतुष्ट करके ही परमात्मा को खुश किया जा सकता है .. मैं तो यही मानती हूं कि हर स्तर पर अपने कर्तब्यों का समुचित पालन करके ही ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है !!
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