रविवार, 30 मई 2010

एक कविता वृन्दावन यात्रा के ऊपर

वृन्दावन हो कर आ भी गया , इस बार थोडा क्रेश कोर्स जैसा किया । इतनी जल्दी थी मुझे कि कृष्ण भी कह रहे थे कि नहीं ऐसा आगे नहीं चलेगा । खैर फिर भी भाव में आकर सोचा कि कृष्ण कि चापलूसी में एक कविता लिख डालू । तो इस बार जहाँ नहीं गया था वहां का वर्णन भी कर दिया । पर कितना लिखता इसीलिए बहुत बहुत संक्षेप में लिखना पड़ा । इसमें वही भाव हैं जो एक वृन्दावन श्रद्धालु को आमतौर पार महसूस होते हैं । जो भी भला लगा वो कृष्ण जी को अर्पित । मेरे नासमझी वाले भाव मैं वापिस ले लेता हूँ ।

जिन शब्दों ने मेरे जीवन में भक्ति के थे भाव भरे
इस्कोन के उस प्रांगन में हरे कृष्ण हरे हरे

अंग्रेजो की भक्ति देखकर मेरा मन भी हिल गया था
जिसे हम ना खोज पाए वो कृष्ण इन्हें मिल गया था

आगे चलकर रिक्शा वालो ने राधे राधे जब आह्वान किया
पहली रोजगारी थी जिसमे प्रभु का भी नाम लिया गया

बांके बिहारी में जाकर जब कान्हा का दीदार हुआ
दिल को चीरकर अपने ही अंदर प्रेम का संचार हुआ

कुञ्ज गलियो में जब कान्हा तेरी याद आने लगी
सेवा कुञ्ज की वो झाडिया जो मरघट सी थी भाने लगी

गाइड बनकर बीस रुपये जब कन्हैया तू मुझसे मांगने लगा
सारा कुछ दान करने वाला मैं तुझसे ना नुकर करने लगा

शांति से भरी उस गली में जब मीरा जी को प्रणाम किया
निधिवन के राधा कीर्तन ने सब कुछ भक्तिमय किया

निकला जब यमुना तीर पर क्या वो प्रेम रस का पसारा था
इसी के सामने तो गोपिओ को समंदर का पानी भी खारा था

कदम्ब वृक्ष पर तू बैठा होगा आंसू गए
द्वापर के वो युग वाले क्षण में कुछ भा गए

केशी घाट की वो नाव मुझे भवसागर से पार ले गई
जमुना जी को वो आरती भक्ति की तरंग दे गई

रंगनाथ जी मंदिर कृष्ण की प्रेम भव्यता का नज़ारा था
गोविन्द देव मंदिर का कद तो औरंगजेब ने भी स्वीकारा था

लालाबाबू मंदिर ने मुझे वैराग्य के कुछ पाठ सिखाये थे
गोपेश्वर मंदिर में शिवजी भी गोपी बन कर आये थे

गोदाविहार जी में तो सब ओर देवी देवता समाये थे
फिर सोचा क्यों अब तक क्यों ये मेरे लिए पराये थे

अभी जल्दी थी कृष्ण इसीलिए ज्यादा ना लिखूंगा
तू पहले इस को पढ़ ले फिर मैं कुछ और कहूँगा


कृष्ण जी मुझे माफ़ करे , मुझसे कोई रहस्य ना खोला जायेगा । जो आप चाहोगे वही लिखा जायेगा । आपकी मर्ज़ी ।

5 टिप्‍पणियां:

Dr. C S Changeriya ने कहा…

बहुत सुंदर

bahut achha laga pad kar

शोभना चौरे ने कहा…

jay shree krshn .bahut achha varnan.

SANJEEV RANA ने कहा…

हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे




वाह क्या बात हैं सरल कुमार जी
मजा आ गया
मैं कही ऐसी जगह नही जा पाया अधिकतर पर कोई बात नही आपने तो मुझे यही बैठे बैठे अपनी सारी यात्रा का मानो आँखों देखा हाल बता दिया हो कविता के जरिये.


इस कृपा के लिए आपका आभारी

vandana gupta ने कहा…

bahut sundar bhav bhare hain.
to krishna ji se shikayat door ho gayi..........gud.

kunwarji's ने कहा…

"कुञ्ज गलियो में जब कान्हा तेरी याद आने लगी
सेवा कुञ्ज की वो झाडिया जो मरघट सी थी भाने लगी

गाइड बनकर बीस रुपये जब कन्हैया तू मुझसे मांगने लगा
सारा कुछ दान करने वाला मैं तुझसे ना नुकर करने लगा"
"जा कि रही भावना जैसी....." वाली बात हो गयी जी ये तो....
maine prtyaksh to aapse ye nahi puchha tha...fir bhi bataaya....
uttar wahi jo mai soch raha tha....


कुंवर जी,

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...