गुरुवार, 27 मई 2010

ईश्वर , प्रेम और जिंदगी के ऊपर एक कविता

कल वृन्दावन जाना हैं तो कृष्ण राधे के प्रेम और हमारे अपने जीवन कि जटिलताओ को जोड़कर एक कविता बना ही डाली । जैसा कि स्वाभाविक हैं मेरे जैसे तुच्छ जीव का प्रेम तो इसमें आएगा ही । चलिए आदत से मजबूर भावुक ना हो जाऊ , इसीलिए आपको श्री चरणों में ये कविता का भाव समर्पित करता हूँ ।

सच्चा प्रेम तो हमेशा विरह पर ही तोला जाता हैं
होता हैं हर शब्द में अर्थ जो बोला जाता हैं

यही मैं सोचता हूँ कि क्या कृष्ण भी मजबूर था
राधा कभी मिलती नहीं ये ही क्यूँ दस्तूर था

पडनी जहाँ खुशिओ की नीव थी
सपने की दुनिया वहां उजड़ गयी थी
सजाई संभाली जन्मो की मेहनत
पल भर प्रेम से बिगड़ गयी थी

जिंदगी जब समझ में आई तो समय ख़त्म हो गया था
जन्म की आरज़ू जहाँ थी , मौत का मातम हो गया था

दुनिया के नाते रिश्ते समाज की अब मैं क्या फ़िक्र करू
धरती कंपाने वाले भी चल बसे मेरा मै क्या जिक्र करू

स्वयं ईश्वर को भी कहाँ जमाना समझ पाया हैं
तेईस अवतारों में भी कहाँ वो चैन पाया हैं

माता लक्ष्मी भी यहाँ परीक्षा दे दे कर जमींदोज हो गयी थी
फिर क्या मेरा अफ़सोस जो किस्मत थोड़ी सी खो गयी थी

अब दुःख हो या सुख हो , वर्तमान या अतीत हो
क्या उसे गुणों से तोलना जो स्वयं गुनातीत हो

दिव्या यात्रा की जब वो अंतिम घडिया निकलेगी
वादा तो नहीं झूठी आस ही सही वीरेन की किस्मत चमकेगी

जो कुछ बन पड़ा उसे एक अकिंचन का लिखा मान हृदय से धारण कीजिये । कृष्ण जी इस समय थोड़े उदास हैं , सिर्फ राधा जी ही इस एक तरफा प्यार को ढोने से बचा सकती हैं । राधा जी का धन्यवाद और आप श्री भक्तो का ।
धन्यवाद्
वीरेन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

kunwarji's ने कहा…

"माता लक्ष्मी भी यहाँ परीक्षा दे दे कर जमींदोज हो गयी थी
फिर क्या मेरा अफ़सोस जो किस्मत थोड़ी सी खो गयी थी"
फिर हमारे जैसो का तो जिक्र भी मूर्खता ही होगी जी.....

कुंवर जी,

vandana gupta ने कहा…

prem aur ishwar to ek doosre ke poorak hain..........prem kaho ya ishwar ek hi hain.

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...