कभी कभी लगता हैं कि हम इतना जीवन जी लेते हैं पर कोई सार नहीं । और सुबह से शाम तक बस कम में लगे रहो का नारा लेकर मशीन बने रहते हैं । इसमें सबसे बुरा हाल हम कम्पनी कर्मचारिओं का होता हैं । वहां सारी चीज़ें इतनी जटिल होती हैं कि एक बार तो मन करता हैं सारा कुछ छोड़ कर भाग लो यहाँ । आखिरी ऐसे हम काम करते हैं जैसे शापित आत्माएं ।
हमारा बोरिंग काम सुबह से शुरू होता हैं जैसे
सुबह सुबह मोबाइल में अलार्म लगाकर सो जाते हैं , हमारा सारा काम तो हमारा मोबाइल पर ही शुरू होता हैं । पारंपरिक अलार्म तो अब शायद ख़त्म ही हो गए हैं । नहीं तो जब हम पढ़ते तो हमें पता था कि ये एक सौ पंतीस रुपये की चीज़ पूरे दिन का टाइम टेबल तय करती थी । और आजकल बस आस्था चैनल पर बाबा रामदेव का योग और फिर एक गुरु जी या किसी दुसरे संत की पूरे दिन के लिए अध्यात्मिक डोज़ लेकर हमारे बाथरूम कम गैराज में घुस लेते हैं जहाँ पर तू निकल मुझे जाना हैं की तर्ज़ पर एक घंटा अति संवेदनशील हो जाता हैं । पांच मिनट की देरी हुई नहीं की ऑफिस बस लेट होते ही पारंपरिक तरीको से आप एक घंटे लेट हो जाते हैं ।
अगर बस पकड़ ली तो क्या आगे एक बंदा फिर बस रुकवा देता हैं । और हमें अफ़सोस होता हैं की इनके लिए इतनी देर और मेरी लिए पांच मिनट भी नहीं । जद्दोजहद के बाद सीट मिलते ही हेड फोन पर गाना सुनना और ट्रेफिक की भीड़ में कोई गाड़ी ठुक जाने पर मज़े लेना और अपनी ठुक जाये तो राजी नामे को दौर।
जैसे तैसे कम्पनी पहुंचना और बस सारा दिन कम में उलझे रहना या बॉस की डांट खाते रहना , बड़ाई तो दुरलभ सी हो जाती हैं । बस पांच बजते ही सारा ताम झाम समेटना । घर आकर खाना खाना और टी वी देखना । पैसे लेकर दिखाई जा रही खबरों को लेकर उदास होना और फिर कोई कोमेडी या होलीवूड की फिल्म देखकर संतोष करना । कुछ काम हो तो बाज़ार का एक राउण्ड या किसी दोस्त के यहाँ पेशी। बस दस ग्यारह बजे सो जाना ।
इतना घिसा पिटा दिन का काम फिर भी पता नहीं जी रहे हैं । कोई आनंद नहीं फिर भी लगे हुए हैं । जैसे सारी सोच को लकवा मार गया हैं । कोई कहता हैं कि उद्देश्य बनाओ तब थोडा ठीक रहेगा । अब हर व्यक्ति के उद्देश्य को भी
लेकर विवाद हैं
धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं कि ईश्वर को पाना उद्देश्य होता हैं , इसी लिए सारा संत भक्ति से जुड़े कामो को बढ़ाने के लिए कहते हैं । पर ये इतना लम्बा सफ़र और एक तरफ़ा रास्ता लगता हैं कि यार फिर तो कुछ भी जरुरी नहीं हैं । क्यों हम खामख्वाह टाइम ख़राब कर रहे हैं दुनिया में ।
और फिर कैरिएर बीवी बच्चे समाज , इतना बड़ा माया का जाल कुछ भी जंजाल के अलावा लगता नहीं । महंगाई से लोग मर रहे हैं पर शीला दीक्षित कि स्वघोषित महंगाई पलायन बयानबाजी से भी मन कुढ़ सा जाता हैं । ये तो थी मेरी दिनचर्या आपकी इससे काफी अच्छी हो सकती हैं । आप भी अपनी बात शेयर करें ।
मेरा तो आखिर में बस दिमाग सोचना बंद कर देता हैं और बस एक प्रार्थना उभरती कि हे भगवान् तू जहाँ भी हैं बस इसी पल एक बार के लिए आ जा और हमें मुक्त करके ये रहस्य बता कि आखिर ये सब दुनियादारी क्या हैं .
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...
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3 टिप्पणियां:
मुझे नहीं पता, तुम्हें मेरा विचार अच्छा लगेगा या नहीं। लेकिन आज से कुछ समय पहले मैं भी हताश दुखी रहता था। लेकिन जब सच्चे प्रभु से मिलन हुआ तो सब दुख सुख में बदल गए।
ईश्वर को आज तक किसी ने परिभाषित नहीं, लेकिन जो मैंने जाना, वो ईश्वर हमारे भीतर है, और कला ही उसका असली रूप है, तुम्हारी कला ही तुम को सुख शांति यश और समृद्धि दे सकती है। जो तुम ईश्वर से पाने की इच्छा रखते हो।
-: कुलवंत हैप्पी
yahi to duniya h
wo kahte hain na
"jo haath aaye to but aur na haath aaye to khuda"
is jhaalmel ka naam hi jindgi h dost
dekhiye aap apni jgh shi h,jindgi chij hi esi hjise hm n to niymo me band skte h,or sayd n hi iske sbhi rang jan skte h,sayd aaj tk sbhi insano ne iska nya rang dekha h,jindgi me aapke pas chunne k liye bhi bhut kuchh h or bhut kuchh esa h ki jis per aapka bilkul bhi jor nhi h,jindgi k liye hm'jindgi' sabd k alawa koi dusra sabd istemal nhi kr skte
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