बुधवार, 17 मार्च 2010

उद्धव जी को गोपियों द्वारा सगुण ब्रह्म की व्याख्या और ज्ञान से भी श्रेष्ठ प्रेम की प्रामाणिकता

उद्धव जी भगवान् श्री कृष्ण के चचेरे भाई थे । उनकी निर्गुण निराकार ब्रह्म में स्थिति हो चुकी थी । इसमें थोड़ी अपरिपक्वता की स्थिति के चलते वो सगुन ब्रह्म को थोडा कमतर आंकते थे । भगवान् कृष्ण अपने प्रिय भाई को प्रेम और भक्ति की महिमा दिखाकर सगुन ब्रह्म को भी समान दिखाना चाहते थे । इसीलिए उन्होंने उद्धव जी को गोपियों को अपने परमात्म स्वरुप का ज्ञान देने के लिए वृन्दावन भेजा । उद्धव जी जब वहां गए तो गोपियों और राधाजी के दर्शन और क्रियाओं से अपने आपको बिलकुल हीन समझने लगे

उद्धव ने सबसे पहले ज्ञान की बड़ाई शुरू की कि इससे आपको कण कण में व्याप्त परमात्मा जो निराकार हैं वो मिल जाएगा आप सबको कृष्ण से बिछुड़ना दुःख देता हैं पर जैसे आप उसकी याद में पागल हो वो कृष्ण का शरीर तो पंचतत्वो का , तुम्हारे लिए कैसे प्रगट होगा ऐसे ऐसे कुछ प्रवचन दिए जिससे वो निर्गुण ब्रह्म को जाने पर गोपिया जो ऋषिओं ,मुनिओं और वेदों की श्रुति का अवतार मानी जाती हैं उन्होंने उद्धव जी को कहना शुरू किया , जो मैंने नीचे संकलित किया हैं , ये भजन प्रसिद्ध धारावाहिक श्री कृष्ण से लिया हैं जो श्री रामानंद सागर जी द्वारा निर्मित हैं

ज्ञान तिहारो आधो अधुरो मानो या मत मानो
प्रेम में क्या आनंद रे उद्धव प्रेम करो तो जाने ,

प्रेम की की भाषा न्यारी हैं , ये ढाई अक्षर प्रेम वेद शास्त्र पे भारी हैं
कहत नहीं आवे शब्दन में , जैसे गूंगो गुड खावे स्वाद पावे मन ही मन में

क्या करे हम ईश्वर को जो द्वार हमारे ना सके
माखन की चोरी कर ना सके मुरली की तान सुना ना सके
मन हर ना सके छल कर ना सके, दुःख दे सके ,तरसा ना सके
जो हमरे हृदय लग ना सके हृदय से हमें लगा ना सके
ऐसो इश्वर छोड़ हमारे मोहन को पहचानो
प्रेम में क्या आनंद रे उद्धव प्रेम करो तो जानो

प्रेम की मीठी बानी हैं , प्रेम की मीठी बानी हैं
खारो हैं ज्ञान को
सिन्धु प्रेम जमुना को पानी हैं
प्रेम रस बही रह्यो नस नस में ,
अरे नैन वैन सुख चैन रैन दिन कछु नहीं बस में

ब्रह्म ज्ञान को कछु दिन छींके पे धरी देय
हम गोपीन संग बैठ के प्रेम की शिक्षा लेय
भले मानुष बन जाओगे , जप जोग ज्ञान ताप छोड प्रेम के ही गुण गाओगे
निर्गुण को भूल निरे गुण वाले के गुण गाओगे
कछु दिन रहा देखो ब्रज में , हैं प्रेम ही प्रेम की गंध यहाँ की प्रेम भरी रज में

कोई मोहनी मूरत सोहनी सूरत जा दिन जादू कर जाएगी
प्रेम की नागिन डस जाएगी ,
जे वस्त्र होंगे तार तार लट घूघरी पारी बिखर जाएगी
पीर कलेजे भर जाएगी
जब प्रेम की मदिरा चखोगे तो ज्ञान की भांग उतर जाएगी
तब जन्म और सुध बुध सुधरेंगे उधो तब दशा बिगड़ जाएगी
डगमग चाल चलोगे लोग कहे दीवानों
प्रेम में क्या आनंद रे उद्धव प्रेम करो तो जानो
सखा बोराए डोलोगे यूँ ही पगलाए डोलोगे
तुम ज्ञान की भाषा छोड़ हमारी बोली बोलोगे
प्रेम गति उद्धव क्या जानो प्रेम गति उद्धव क्या जानो
हैं प्रेम जगत में सार हमारे अनुभव की मानो

अब आकाशवाणी या पाश्र्व स्वर होती हैं

दृढ करने को प्रेम पर उद्धव का विश्वास
सखिया उनको ले चली राधा जी के पास
यही श्री राधा रानी हैं रही श्री राधा रानी हैं
श्री कृष्ण चन्द्र के अमर प्रेम कि अमित निशानी हैं
इन्हें प्रणाम करो उधो
पथ
धर्म अर्थ काम और मोक्ष को मिल जाएगो सूधो

राधा
जी के दर्शन से उद्धव को थोडा प्रेम का ज्ञान तो हुआलेकिन फिर भी तर्क देते रहे कि आपके इस माध्यम से आप इश्वर को सदा भगवान् को अपने पास सगुन रूप में नहीं देखते जैसे मैं निर्गुण ब्रह्म को हमेशा अनुभव करता हूँ अर्थात आपका सगुन भगवान् तो द्वारिका में हैं और यहाँ इस समय आपके बुलाने पर भी नहीं सकताराधा जी ने कहा कि हमें उसे बुलाने कि जरुरत नहीं हैं वो तो हमारे पास ही हैंतभी उद्धव ने देखा कि कृष्ण जी तो राधा जी के बिलकुल बगल में बैठे हुए हैंफिर निष्कर्ष रूप में गीत उभरता हैं

उद्धव जी को मिल गयो साँचो प्रेम प्रमाण
भ्रम गयो संशय गयो जागो सांचो ज्ञान

श्याम और राधा को संग जो पाया तो आँख खुली और बुद्धि हैरानी
उद्धव बेचारा समझ नहीं पाए क्या हैं वास्तव क्या और क्या हैं कहानी
प्रेम कि ऐसी अवस्था जो देखि तो ज्ञान गुमान पे फिर गया पानी
भक्त के वश में जो भगवन देखे तो प्रेम और भक्ति कि महिमा जानी
प्रेम से भर गया श्रधा से भर गया चरणों में पड़ गया ब्रह्म का ज्ञानी

इसके बाद उद्धव जी राधा जी के चरणों में पड़ जाते हैं

2 टिप्‍पणियां:

Taarkeshwar Giri ने कहा…

Hari Krishan Hare - Hare

kunwarji's ने कहा…

"उद्धव जी को मिल गयो साँचो प्रेम प्रमाण
भ्रम गयो संशय गयो जागो सांचो ज्ञान
प्रेम से भर गया श्रधा से भर गया चरणों में पद गया ब्रह्म का ज्ञानी"

उद्धव जी को बहुत ही प्रेक्टिकल तरीके से समझाए जाने का प्रसंग बहुत बढ़िया बन पड़ा है!
जब ये धारावाहिक देख था तो ये कडिया ही सबसे बोरिंग लगी थी वैसे!

कुंवर जी

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